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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ५५ [ १२ ] जनेऊ का प्रश्न समाप्त नही हुआ था कि यह बिकट रौरा खडा हो गया । जिन थोडे से लोगो का जीवन विविध समस्याओ के काटो पर होकर सफलतापूर्वक गुजर रहा था, वे तो नारायण शास्त्री के कृत्य की निन्दा करते ही थे, परन्तु जिनका भीतरी जीवन-बाहरी छल से भिन्न था—जो जीवन के काटो पर गुलाब की सेजो को अंगूरी की—या महुये की—मोहक सिंचाई से मीठा बना बनाकर हर घडी को मौजो में बाट बाटकर, चल रहे थे—उन्होने नारायण शास्त्री की सबसे ज्यादा बुराई की । पाखण्डी है, पाजी है, धर्म-द्रोही, राक्षस है, इत्यादि—और उसको कम से कम प्राणदण्ड मिलना चाहिये । और छोटी को ? उसके टुकडे टुकडे करके स्यारो को खिला देना चाहिये, क्योकि उसी ने तो एक विद्वान ब्राह्मण को पतित किया । इतनी बडी बात बिना विलम्ब राजा के पास न पहुँचे, यह असम्भव था । राजा ने जब सुना, कभी हँसी आती थी और कभी उनको क्षोभ-संताप होता था । छोटी और नारायण शास्त्री बुलाये गये । मालूम होता था जैसे शास्त्री कुछ घण्टो में ही बूढे हो गये हो । छोटी चिंतित थी, परन्तु उसके पैर जम-जमकर किले की ओर गये थे । जब वह गंगाधरराव के सामने पहुँची, तब उसको पसीना जरूर आ गया था । इस मामले का निर्धार सुनने के लिये भी तात्या टोपे गया । नारायण शास्त्री को उस बीभत्स में डूबा देखकर राजा को बडे ज़ोर की हँसी आने को हुई । उन्होने कठोरता के साथ अपना दुस्सह सयम किया । पूछ-ताछ शुरू की । राजा—‘यह क्या हुआ शास्त्री ?’ शास्त्री—‘जो होना था हो गया सरकार ।’ राजा—‘कैसे हुआ ?’ शास्त्री—‘क्या कहूँ श्रीमन्त ,’ राजा—‘बतलाना तो पड़ेगा । न बतलाने से ज्यादा नुकसान होगा ।’