भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

५६ झांसी की रानी शास्त्री—'क्या बतलाऊँ महाराज ?' राजा—'यह कैसे हुआ ?' शास्त्री—'तप और सयम के अतिरेक से । जब शरीर ने ताडना न सह पाई, तब जो-जो कुछ उसके सामने आया, ग्रहण कर लिया ।' राजा—'तुमको तो लोग बहुत दिन से शृङ्गार शास्त्री कहते हैं।' शास्त्री—'वह तो उपकरण मात्र था ।' राजा—'सुनता हूँ कोकशास्त्र का भी अध्ययन किया है ।' शास्त्री—'हाँ सरकार ।' राजा—'क्यो ?' शास्त्री—'उस शास्त्र मे अपने सम्बन्ध के प्रसंग ढूँढने के लिये, और यह जानने के लिये कि इसमें ऐसा क्या है, जिसने महर्षि वात्स्यायन से कामसूत्र की रचना करवाई ।' राजा—'क्या पाया ?' शास्त्री—'प्रकृति के साथ जीवन की टक्कर ।' राजा—'आगे क्या पाओगे ?' शास्त्री—'यह मेरे हाथ मे नही है सरकार ।' राजा—'तब किसके हाथ में है ?' शास्त्री—'सरकार के ।' राजा ने थोडी देर सोचा । उपस्थित लोगो पर दृष्टि घुमाई । छोटी की विनम्र आंख को देखा । वडे पलक और वडी वरौनियां । फिर अपने ब्राह्मणत्व का ख्याल किया । बोले, इस लडकी को तुरन्त झाँसी का राज्य छोडना पडेगा । इसके लिये देश-निकाले का दण्ड काफी है । तुमको……' छोटी ने तुरन्त दृढ स्वर में टोका, 'श्रीमंत सरकार शास्त्री महाराज का कोई कसूर नही है । मै इनके पीछे पड गई, इसलिये इनका पतन हुआ । मेरे दण्ड को बढाकर इनके दण्ड की कमी को पूरा कर लीजिये । में सिर कटवाने के लिये तैयार हूँ ।'