झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ५७ राजा को रत्नावली नाटक का एक दृश्य प्रासंगिक न होने पर भी याद आगया, रत्नावली को भगवान ने आत्मवध से बचाया था । राजा बोले—'ठहर जा लडकी । शास्त्री, तुमको विधिवत् प्रायश्चित करना पडेगा । पञ्चगव्य इत्यादि ।' शास्त्री—'और इसको देश-निकाला होगा ?' राजा—'हा ।' नतमस्तक अपराधी का सर ऊंचा हुआ । जैसे कीचड में से कमल फूट पडा हो । बोला, 'सरकार, मै प्रायश्चित नही करूंगा । मैंने कोई पाप नही किया है । यदि मुझको प्रायश्चित की आज्ञा दी जाती है तो पहिले लगभग आधे शहर को पञ्चगव्य लेना पडेगा । 'क्यो ?' राजा ने जरा विस्मय के साथ पूछा । शास्त्री ने छोटी से आग्रह किया, 'बतला दे सरकार को ।' छोटी ने अपने वस्त्रो मे से मिट्टी की दो डबुलिया निकाली और उनमें से जनेऊ । राजा ने उत्सुक होकर प्रश्न किया, 'यह क्या है छोकरी ?' नीची गर्दन किए, बिना आख मिलाए छोटी ने उत्तर दिया, 'बडी जातो के जिन-जिन लोगो ने मुझको फासने की कोशिश की उन सबके मैंने जनेऊ उतरवाये और इन डबुलियो में इकट्ठे किये । सुनने वाले सन्नाटे में आगए । राजा जरा असमंजस मे पडे । फिर यकायक हँस कर शास्त्री से बोले, 'तुमने इस स्त्री को केवल अपना तन ही दिया, या मन भी ?' शास्त्री ने कोई उत्तर नही दिया । छोटी कुछ कहना चाहती थी, परन्तु राजा ने उसको हाथ के सकेत से वर्जित करके शास्त्री से फिर प्रश्न किया, 'तुम इस स्त्री को भ्रष्ट समझते हो या नही ?' शास्त्री के मुह से यकायक निकला, 'नही सरकार ।'