झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 69, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ झाँसी की रानी गंगाधरराव कुछ क्षण विचार निमग्न रहे। फिर गम्भीर स्वर में बोले 'इस स्त्री के साथ और किसी का भी ससर्ग नहीं है, मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं। इन यज्ञोपवीतो की कहानी तुम्हारी ही गढन्त जान पड़ती है। मैं सूत के इन डोरो को छूना नही चाहता। यदि परीक्षा करू तो पुरानो में ब्रह्मगाठ लगी होगी और नये बिना किसी गाठ के होगे। ये सब तुम्ही ने इसको दिये होगे।' शास्त्री पसीने में तर हो गये। राजा कहते गये,'तुम समझते होगे कि तुम्हारे सिवाय सब मूर्ख हैं। तुमको अवश्य कठोर दण्ड देता, परन्तु तुमको दण्ड देने से इस अभागी का दण्डभार वढ जायेगा।' छोटी रोने लगी। बोली, 'मै भुगतने को तैयार हू।' राजा ने रूखे स्वर में शास्त्री से कहा, 'तुम प्रायश्चित पञ्चगव्य के लिये तैयार नही हो, इसलिये तुमको भी झांसी तुरन्त छोडनी पडेगी।' शास्त्री प्रसन्न हुये। बोले, 'बडा अनुग्रह हुआ। मै इसी के साथ झांसी छोड़ देने को तैयार हू।' वे दोनो चले गये। राजा ने तात्या टोपे की ओर देखा। वह बिलकुल संतुष्ट जान पडता था। राजा ने सोचा, 'बहुत सस्ता छूटा यह। वह लडकी छोटी जाति की होने पर भी इस ब्राह्मण से बडी है। देश-निकाला दे दिया, काफी है। विठूर के लोग भी इसी निर्धार से सन्तुष्ट होगे। अधिक कड़ा दण्ड देने से झांसी के बाहर बदनामी ज्यादा होती। और फिर अङ्गरेज • अङ्गरेज...' फिर और आगे उन्होने नही सोच पाया। छोटी और शास्त्री दूसरे दिन झांसी छोड़ कर चले गए।