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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ५६ [ १३ ] मोरोपन्त, मनूबाई इत्यादि के ठहरने के लिये कोठीकुआँ के पास एक अच्छा भवन शीघ्र ही तै हो गया । तात्या टोपे कुछ दिन झाँसी ठहरा रहा । निवास स्थान की सूचना बिठूर शीघ्र भेज दी । टोपे को बिठूर की अपेक्षा झाँसी ज्यादा पसन्द आई । उसकी कल्पना गङ्गाधरराव की नाटकशाला में बार बार उलझ जाती थी । इसके सिवाय झाँसी का रहन-सहन, यहाँ के स्त्री-पुरुष और यहाँ का प्राकृतिक वातावरण उसको ब्रह्मावर्त के गङ्गा तट से अधिक मनोहर लगे । जब बिठूर लौटा अवसर पाकर उन बालको ने झाँसी के विषय में सवालो की झडी लगा दी । नाना — ‘क्या झाँसी बिठूर से बडा नगर है ?’ तात्या — ‘कुछ बडा ही होगा । किला वडा है । नगर के चारो ओर परकोटा है । बस्ती पहाडी की ऊँचाई-निचाई पर बसी है । इसलिये बरसात में कीचड नही मचती होगी । घर घर कुये हैं । नगर के भीतर इधर-उधर फल-फूलो के बगीचे । भीतर-बाहर तालाब, अच्छे अच्छे मन्दिर । किला पहाडी पर है । उसमें राजमहल है । महादेव और गण- पति के मन्दिर हैं । एक वडा महल नीचे है । महल के पीछे नाटकशाला ।’ मनू — ‘नाटकशाला ! उसमें क्या होता है ?’ तात्या — ‘अच्छे अच्छे नाटक खेले जाते हैं । गायन-वादन होता है ।’ मनू — ‘मै भी देखूँगी ।’ तात्या — ‘श्रीमन्त राजा साहब तो नित्य ही नाटकशाला में जाते हैं । मुझको भी बुलवा लेते हैं ।’ मनू — ‘हाथी कितने हैं ?’ तात्या — ‘दस या शायद ज्यादा हो ।’ मनू — ‘घोडे ?’

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