झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० झांसी की रानी तात्या—'सरकार को घोडे की सवारी पसन्द नही है। तामझाम में चलते हैं।' नाना—'सेना कितनी है?' तात्या—'कई हजार है।' मनू—'ठीक नही गिनी?' तात्या—'बिलकुल ठीक तो नही, परन्तु आठ और दस हज़ार के बीच में होगी।' मनू—'लोग कैसे हैं?' तात्या—'उनके शरीर दृढ़ और स्वस्थ हैं। व्योपार अच्छा है। शहर में चहल-पहल मची रहती है। धनधान्य खूब है। गरीबी बहुत कम देखने में आई है। स्त्री-पुरुष सुखी दिखलाई पडते थे। सन्ध्या समय लोग फूलो की माला डाले बगीचो और बाजारो में घूमते हैं। स्त्रिया घी के दिये थालो में सजाकर पूजन के लिये लक्ष्मी जी के मन्दिर में जाती हैं।' रावसाहब—'कुश्ती मलखम्ब के अखाडे हैं?' मनू—'मै भी यही पूछना चाहती थी।' तात्या—'हैं तो, परन्तु लोगो में गाने-बजाने का अधिक शौक दिखलाई पड़ता है।' रावसाहब—'क्या रास्तो मे गाते-बजाते फिरते हैं?' तात्या—'नही तो।' मनू—'फिर क्या नाटकशाला मे गाते बजाते हैं?' तात्या—'नही—घरो पर, समाजो, उत्सवो पर। जान पडता है मानो गाने का मिस ढूँढ रहे हो। स्त्रिया तो गाने का कोई न कोई बहाना लिये रहती हैं। पीसने के समय तो सब कही स्त्रिया गाती हैं, परन्तु झांसी में पानी भरने जावे तो गाये, पानी भरते समय गाएँ। शायद मरती भी गाते गाते होगी।' मनू—'झांसी में तोपे कितनी हैं?'