भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

६२ झाँसी की रानी [ १४ ] यथा समय मोरोपन्त मनूबाई को लेकर झाँसी आगये । तात्या टोपे भी साथ आया । विवाह का मुहूर्त शोधा जा चुका था । धूमधाम के साथ तैयारिया होने लगी । नगर वाले गणेश मन्दिर में सीमन्ती, वर पूजा इत्यादि रीतियाँ पूरी की गईं । राजा गङ्गाधरराव घोडे पर बैठकर गणेश मन्दिर गये । उस दिन मनूबाई ने पहले पहल गङ्गाधरराव को देखा । गङ्गाधरराव का मुख-सौंदर्य अब भी वैसा ही था । आँखों का तेज लाल डोरो के कारण आकर्षक कम, भयानक ज्यादा मालूम होता था । पेट कुछ बढा हुआ, परन्तु भद्दा नही लगता था । रंग सांवलापन लिये हुये । सारी देह एक बलवान पुरुष की । मनू का ध्यान शरीर के इन अंगो पर एकाध क्षण ठहरकर उनके सवारी के ढंग पर जा अटका । वह मुस्कराई । अपनी सम्मति प्रकट करने के लिये आस-पास लडकियो मे किसी उपयुक्त पात्र को मन ही मन ढूंढने लगी । उस समय मनू ने सोचा, 'यदि इस घडी नाना या राव यहा होते तो उनको सब बाते सुनाती समझाती ।' राजा गङ्गाधरराव धीरे-धीरे, रुकते-रुकते गणेश मन्दिर को जा रहे थे । नगर निवासी प्रणाम करते जाते थे और वे मुस्कराकर प्रणाम का जवाब देते जाते थे । यकायक मनू के सामने एक मराठा-कन्या आई । आयु १५ से कुछ ऊपर । शरीर छरेरा । रंग हलका सांवला । चेहरा जरा लम्बा । आंखें बडी । नाक सीधी । ललाट प्रशस्त और उजला । जैसे ही वह मनू के पास आई उसने आंखें नीची करके आदरपूर्वक प्रणाम किया । मनू को ऐसा लगा मानो पहले से परिचित हो । उससे बात करने की तुरन्त इच्छा उमड़ी ।