भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ६३ बोली, 'तुम कौन हो ?' उसने उत्तर दिया, 'आपकी दासी सुन्दर मेरा नाम है ।' मनू — मेरी दासी ! कैसे ?' सुन्दर — 'आप हमारी महारानी हैं में सेवा में रहूंगी । आपकी दासी होकर अपना भाग्य बढाऊँगी ।' मनू — 'मेरी दासी कोई न हो सकेगी । मेरी सहेली होकर रहोगी ।' मनू ने उसका हाथ पकड कर अपनी ओर खीचा । वह झिझकी । मनू ने उसका हाथ ढीला करके पूछा, 'तुम क्या सचमुच सदा मेरे पास रहोगी ?' 'सदा सरकार,' सुन्दर ने उत्तर दिया, 'हम १६ दासिया आपकी सेवा में रहा करेगी ।' मनू को हँसी आई, परन्तु उसने रोकली । गङ्गाधरराव की सवारी अब भी सामने थी । मनू ने धीरे से सुन्दर से कहा, 'तुम घोडे पर चढना जानती हो ?' सुन्दर बोली, 'थोडा सा । दौडना खूब जानती हूँ । कोस भर दौड जाऊँगी और हाफ न आयगी ।' 'धीरे धीरे जाने वाले घोडे को भी यह जाघ से कसे जा रहे हैं ।' गङ्गाधरराव की ओर से सकेत करके मनू ने कहा । सुन्दर ने चकित होकर पूछा, 'आपने कैसे जाना सरकार ?' मनू हँसी । दातो की सफेदी चेहरे के निखरे गोरे रग से होड लगाने लगी । मनू ने कहा, 'तुम हथियार चलाना जानती हो सुन्दर ?' 'नही सीखा । सुन्दर ने जवाब दिया । इतने में गङ्गाधरराव की सवारी आगे बढगई । दो लडकियाँ और मनू के निकट आई सुन्दर की ही उम्र की एक । दूसरी लगभग १४ वर्ष की । उन्होने भी सिर झुकाकर प्रणाम किया । सुन्दर ने परिचय दिया, 'इसका नाम मुन्दर है और इसका काशी । मेरी तरह यह भी आपकी दासिया हैं ।'