झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ झांसी की रानी मनू ने बिना किसी प्रयत्न के कहा, 'मेरी सहेलिया बनकर रहोगी । दासी मेरी कोई भी न होगी ।' वे दोनो हर्ष के मारे फूल गई । काशी जरा छोटे कद की और सुगठित शरीर वाली । मुन्दर छरहरे शरीर की और जरा लम्बी । मुन्दर और काशी दोनो गौर वर्ण की । मुन्दर का चेहरा बिलकुल गोल, आँखे सुन्दर से कुछ ही छोटी, परन्तु चञ्चल और तेज । काशी की कुछ बड़ी और स्थिर । मनू ने तीनो से अलग अलग प्रश्न किये । 'तुम लोग कौन हो ?' तीनो ने उत्तर दिया, 'कुणभी ।' 'झांसी मे कब आईं ?' 'पुरखे आये थे ।' 'झांसी के आसपास घूमी हो ?' 'बहुत कम ।' 'घोडे पर चढ़ना जानती हो ?' 'थोडा थोडा ।' 'हथियार चलाना ?' सुन्दर तो पहले ही बतला चुकी थी । मुन्दर ने तलवार चलाना सीखा था और काशी ने बन्दूक । मनू को जानकर अच्छा लगा । बोली, 'मैं तुम लोगो को घोड़े पर चढ़ना सिखाऊँगी । हथियार चलाना भी । मलखम्ब जानती हो ?' वे तीनो सिर नीचा करके मुस्कराई । सिर हिला दिये,— 'नही जानती ।' 'गाना-बजाना जानती हो ?' मनू ने बहुत सूक्ष्म चुटकी लेते हुये कहा । सुन्दर बोली, 'वह तो हम तीनो जानती हैं । हम लोग जब सरकार की मर्जी होगी, सुनावेगी ।'