झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ६५ मनू ने कहा, 'जब इच्छा होगी सुनूँगी । परन्तु मुझको उसका शौक कुछ कम है वह अच्छा है, किन्तु घुडसवारी, हथियार चलाना, मलखब, कुश्ती, प्राचीन गाथाओ का श्रवण—ये सब—मुझको बहुत अधिक भाते हैं ।' 'कुश्ती !' सुन्दर ने अपने बडे नेत्रो को जरा घुमा कर आश्चर्य प्रकट किया । मनू के होठो पर सहज मुस्कराहट आई । बोली, 'हा कुश्ती भी यह बहुत आवश्यक है । फिर किसी समय बतलाऊँगी । अभी अवसर नही है ।' इतने में कुछ और स्त्रिया पास आने को हुईं, परन्तु कुछ दूर ठिठक गई । मनू ने उनको उस समय अपने पास बुला लेने की जरूरत नही समझी । मनू कहती गई, 'पुरुषो को पुरुषार्थ सिखलाने के लिए स्त्रियो को मलखब, कुश्ती इत्यादि सीखना ही चाहिये । खूब तेज दौडना भी । नाचने-गाने से भी स्त्रियो का स्वास्थ्य सुधरता है, परन्तु अपने को मोहक बना लेना ही तो स्त्री का समग्र कर्तव्य नही है ।' चौदह वर्ष की मनू अपने से अधिक वय वाली लडकियो से जो कह गई, वह पास ठिठकी हुई उन स्त्रियो ने भी सुन लिया । सुन्दर, मुन्दर और काशी यह सब सुनकर जरा झँपी । उनकी मुस्कराहट चली गई । परन्तु मनू अब भी मुस्करा रही थी । वह मुस्कराहट उन लडकियो को, उन स्त्रियो को जीवन के कोष में कुछ दे सा रही थी । उन लडकियो का सहमा हुआ जी शीघ्र ही लहलहा गया । अन्य लडकियो तथा स्त्रियो को भी मनू ने अपने निकट बुला लिया । ये स्त्रिया उन तीन लडकियो की अपेक्षा अधिक सहमी हुई थी । मनू ने उनको अपना मन खोलने के लिये उत्साहित किया । स्त्रियो की ओर से प्रस्ताव, गायन इत्यादि द्वारा अपने हर्ष को प्रदर्शित करने का हुआ । उसने बिना किसी विशेष उत्साह के स्वीकार किया ।