भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

लक्ष्मीबाई ६७ पुरुषो जैसे काम सीखने की बात सुनते ही स्त्रियो के चेहरो पर लाज की हल्की लाली दौड गई । परन्तु मनके हर्ष और उत्साह ने लाज को दबा दिया । काशी ने स्थिर दृष्टि और स्थिर स्वर में कहा, 'हम लोगो को जो कुछ सिखलाया गया है उतना ही हम जानती हैं । अब जो कुछ सरकार की आज्ञा होगी उसको हम लोग जी लगाकर और दृढता के साथ सीखेगे । परन्तु कुश्ती और मलखब कौन सिखलावेगा ?' मनू ने तुरन्त बतलाया, 'जितना मै जानती हूँ, मै सिखलाऊँगी । वाकी बिठूर के प्रसिद्ध आचार्य बाला गुरू । उनको यहाँ बुला दूँगी ।' बाला गुरू का नाम सुनते ही लडकिया शरमा गई और उनसे बडी उम्र की स्त्रिया हँस पडी । उस हँसी पर मनू के मन में क्षोभ उठा, परन्तु मनू ने उसको नियन्त्रित कर लिया । फिर उसी मुस्कराहट के साथ बोली, 'बाला गुरू देवता हैं, और न भी हो तो तुमको क्या डर ? स्त्रिया दृढता का कवच पहिने तो फिर ससार में ऐसा पुरुष कोई हो ही नही सकता जो उनको लूट ले । बाला गुरू के साथ लडकर कुश्ती सीखने की जरूरत नही पडेगी । वह बतलाया भर करेगे । अखाडे मे उतरकर सिखलाऊँगी मैं ।' गणेश मन्दिर पास ही था । वाद्य बज रहे थे । उनमे होकर कभी कभी मीठी शहनाई की चहक भी सुनाई पड जाती थी । स्त्रिया मनू से श्रृंगाररस की बात करने आई थी । अपने आदर के झरोखे मे होकर । मनू के मन की धारा गंगाधरराव की सवारी, बाजो-गाजो और झासी निवासियो के हर्षोन्माद से सघर्ष पाकर दूसरी ओर चली गई थी । सब स्त्रिया लडकिया भी अपने अच्छे से अच्छे वस्त्र और आभरण पहिने हुये थी । केश खूब संवारे गये थे और उनमें रंग-बिरगे और सुगन्धित फूल गुँथे हुये थे । मनू के केशो मे भी फूल थे । मनू ने हँसकर कहा, 'तुम लोग यदि कुश्ती सीखने के लिये इसी समय अखाडे मे उतरो तो क्या हो ?' सुन्दर मुस्कराकर बोली 'तो इन फूलो से सारा अखाड़ा भर जावेगा ।'