झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ झांसी की रानी
मनू ने हँसकर कहा, 'और तुम्हारे बालो मे अखाडे की मिट्टी भर जावेगी।' वे सब खिलखिला पडी । मनू बोली, 'परन्तु वह मिट्टी तुम्हारे केशो पर इन फूलो से कही अधिक सुहावनी लगेगी।' मुन्दर बोली, 'सरकार, बालो की शोभा मिट्टी से ?' मनू ने मुन्दर का कन्धा हिलाकर कहा, 'ये फूल कहा से आये ? कहा जायेगे ? ये क्या मिट्टी से बढकर हैं ?' मनू की बात मे, अपनी दादियो से सुनी हुई ससार की अस्थिरता की झांई सुनकर वे सब सहम गई । मनू समझ गई। बोली, 'नही फूलो से नाता बनाये रक्खो, परन्तु मिट्टी से सम्बन्ध तोड कर नही।' स्त्रियो के मन पर एक दार्शनिक झकोर ठोकर दे गई। उन्होने ऊंचे स्वर में 'हा, हा' कही, परन्तु आँखो से ऐसा जान पडता था, मानो उनका आनन्द कही भाग गया, उन्हे अपनी असगत अवस्था मे क्लेश होने लगा, मानो मनू ने उनके फूलो की भर्त्सना की हो और उनके आदर का अपमान। मनू ने उन सब स्त्रियो से कहा, 'तुम गणेश मन्दिर मे जाकर देखो क्या होता है। मै तब तक इन तीनो से बात करती हूँ। परन्तु एक बात सुनती जाओ। मुझको तुम्हारे फूल बहुत अच्छे लगे इनको फेक मत देना।' इस बात पर प्रसन्न होकर वे सब चली गई । केवल सुन्दर, मुन्दर और काशी रह गई । मनू बोली, 'मै सुनती हू झासी के लोग फूलो को बहुत प्यार करते हैं। अच्छा है। मुझको भी पसन्द है, परन्तु क्या दुबले पतले घोडे पर सोने-चादी का जीन अच्छा लगता है ?' सुन्दर ने उमग के साथ तुरन्त कहा, 'सरकार मै आपकी बात अब समझी।'