झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ६६ [ १५ ] सीमन्ती इत्यादि की प्रथाएँ पूरी होने के उपरान्त गणेश ' मन्दिर में गायन-वादन और नृत्य हुये और, एक दिन विवाह का भी मुहूर्त आया । विवाह के उत्सव पर आसपास के राजा भी आये । उनमें दतिया के राजा विजयबहादुरसिंह खासतौर से उत्साह प्रदर्शन कर रहे थे । कोठी कुआँ वाले भवन में भावर पडने को थी । बाहर गायन-वादन और नृत्य हो रहा था । सामने वाले मकान में मोतीबाई, जूहीबाई इत्यादि अभिनेत्रिया भरपो के पीछे वस्त्राभूषणो और पुष्पो से लदी बैठी थी । बाहर दुर्गाबाई का नृत्य और उस काल के प्रसिद्ध धुरपदिये मुगलखा का गायन अभ्यन्तर के साथ हो रहा था । मुगलखा के ध्रुवपद-अालाप इत्यादि पर अनेक लोग वाह वाह कर रहे थे, परन्तु जनता दुर्गाबाई के नृत्य के लिये बार-बार अकुला उठती थी । इसलिये मुगलखा ने अपना तम्बूरा रख दिया और दुर्गाबाई को खडे होने का इशारा किया । राजा विजयबहादुर महफिल में मसनद पर बैठे थे । उन्हे ऊँचे दर्जे के गायन और नृत्य-दोनो का व्यसन था । दुर्गाबाई नृत्य करने को खडी होने को ही थी कि भीतर से इत्रपान का सामान आया । सोने के वर्कों से लिपटे पान और वढिया इत्र । पान लाने वाले एक सरदार थे । उन्होने कहा कि भावर शुरू हो गई । उसी समय भीतर एक घटना हुई । पुरोहित ने मनूबाई की गाठ गंगाधरराव से जोडने के लिये वर की चादर और वधू की साडी के छोर हाथ में पकडे । वृद्धावस्था के कारण हाथ काँप रहा था । गाठ लगाने में जरा सा विलम्ब हुआ । गाठ अच्छी तरह नहीं बँध पारही थी । बार-बार हाथ काप जाता था । मनू मे सोचा, 'मै ही क्यो न इसको बाध दू ?' परन्तु उसने विचार को नियन्त्रित कर लिया । गाठ तो पुरोहित ने बाघली, लेकिन वह कापते हुये हाथो से गाठ का फन्दा कसने में कुछ