भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 80

लक्ष्मीबाई ६६ [ १५ ] सीमन्ती इत्यादि की प्रथाएँ पूरी होने के उपरान्त गणेश ' मन्दिर में गायन-वादन और नृत्य हुये और, एक दिन विवाह का भी मुहूर्त आया । विवाह के उत्सव पर आसपास के राजा भी आये । उनमें दतिया के राजा विजयबहादुरसिंह खासतौर से उत्साह प्रदर्शन कर रहे थे । कोठी कुआँ वाले भवन में भावर पडने को थी । बाहर गायन-वादन और नृत्य हो रहा था । सामने वाले मकान में मोतीबाई, जूहीबाई इत्यादि अभिनेत्रिया भरपो के पीछे वस्त्राभूषणो और पुष्पो से लदी बैठी थी । बाहर दुर्गाबाई का नृत्य और उस काल के प्रसिद्ध धुरपदिये मुगलखा का गायन अभ्यन्तर के साथ हो रहा था । मुगलखा के ध्रुवपद-अालाप इत्यादि पर अनेक लोग वाह वाह कर रहे थे, परन्तु जनता दुर्गाबाई के नृत्य के लिये बार-बार अकुला उठती थी । इसलिये मुगलखा ने अपना तम्बूरा रख दिया और दुर्गाबाई को खडे होने का इशारा किया । राजा विजयबहादुर महफिल में मसनद पर बैठे थे । उन्हे ऊँचे दर्जे के गायन और नृत्य-दोनो का व्यसन था । दुर्गाबाई नृत्य करने को खडी होने को ही थी कि भीतर से इत्रपान का सामान आया । सोने के वर्कों से लिपटे पान और वढिया इत्र । पान लाने वाले एक सरदार थे । उन्होने कहा कि भावर शुरू हो गई । उसी समय भीतर एक घटना हुई । पुरोहित ने मनूबाई की गाठ गंगाधरराव से जोडने के लिये वर की चादर और वधू की साडी के छोर हाथ में पकडे । वृद्धावस्था के कारण हाथ काँप रहा था । गाठ लगाने में जरा सा विलम्ब हुआ । गाठ अच्छी तरह नहीं बँध पारही थी । बार-बार हाथ काप जाता था । मनू मे सोचा, 'मै ही क्यो न इसको बाध दू ?' परन्तु उसने विचार को नियन्त्रित कर लिया । गाठ तो पुरोहित ने बाघली, लेकिन वह कापते हुये हाथो से गाठ का फन्दा कसने में कुछ