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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 526 में से

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पृष्ठ 81

७० झांसी की रानी क्षणों का विलम्ब कर रहे थे। मनू से न रहा गया। बिना मुस्कराहट के और दृढ स्वरं में बोली, 'ऐसी बाधिये कि कभी छूटे नही।' गंगाधरराव सिकुड गये। मोरोपन्त मन ही मन क्षुब्ध हुये। होठ सिकोड लिया। परन्तु पुरोहित खिलखिला कर हंस पडा। उसके पास वाले सब स्त्री पुरुष हँस पडे। कह-कहे लग गये। मनू-पुलकित हो गई। आंखे नीची करके उसने थोडा सा मुस्करा भर दिया। इस कह कहे की आवाज बाहर पहुची और मनू की कही हुई बात भी। वहा भी कह कहे लगे। चारो ओर उस वाक्य की चर्चा हो उठी। सामने वाले मकान में भी समाचार पहुचा। जूही ने, जो अब यौवनावस्था में लहराने को थी, कहा, 'मै तो नाचना चाहती हूँ। ऐसे अवसर पर चुपचाप बैठे-बैठे थक गई हू। इतनी खुशी के समय भी न नाचे तो कब नाचेगे?' मोतीबाई में बाहरी गम्भीरता आगई थी, परन्तु मन आल्हाद में फुदक रहा था। बोली, नाचो कोई हर्ज नही। मै भी नाचना चाहती हूँ, परन्तु घुँघरू बाँधकर नही। बाहर बड़े बड़े राजे महाराजे बैठे हैं। शोर- गुल सुनेगे तो क्या कहेगे?' जूही बोली, 'तबला घुघरू हमको कुछ नही चाहिये, शोर-गुल न होगा। इस पर भी महाराज अगर कुछ कहेगे तो मै भुगत लूगी। आखिर नाटक होगा ही। हमलोग रंगशाला मे नाचे और गावें गे ही। राजे महाराजे नाटक-शाला मे पास से सब कुछ देखेगे ही। मै नही मानूगी।' उन दोनो ने मनमाना नृत्य किया और नर्तकियो ने ताल दिया, परन्तु मीठी थपकी से। बाहर मुगलखा खडा हो गया। बोला, 'वाह जैसा राज्य है, वैसी ही महारानी हमको मिली। दिल चाहता है कि मैं नाचू, परन्तु कभी सीखा नही इसलिये मजबूर हू।' और उसकी आंख मे आसू आगये, बैठ गया। .

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