झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ७१
दुर्गाबाई खड़ी हो गई। बोली, 'उस्ताद यह काम मेरा है। मैं दिल और पैर दोनो से नाचूँगी। आप अकेले दिल से, खेलिये या नाचिये।' और उसने सिर नीचा कर लिया। विजयबहादुर प्रसन्न हुये। स्वभाव से ही जरा सनकी थे। इस समय सनक कुछ तीव्रतर हो गई। बोले, 'दुर्गा खूब अच्छी तरह नाचो, इनाम मिलेगा।' 'बहुत अच्छा सरकार।' कहकर दुर्गा पूरे उत्साह के साथ गाने और नाचने लगी। मुगलखा को इसका गाना खटक रहा था, परन्तु उसके मन की इस चोट को दुर्गा का नृत्य सम्भाल ले गया। थोड़ी देर में भावर की रस्म पूरी हो गई। अन्य रस्मो के पूरा होने पर गङ्गाधरराव वर की सजधज में पावडो पर, फूलो और चावलो की वरसा में, बाहर आये। सबने ताजीम दी। गाना बजाना थोड़ी देर के लिये वन्द हो गया। गङ्गाधरराव एक ऊँची मसनद पर जा बैठे और इधर उधर बारीकी के साथ देखने लगे कि मनू के उस वाक्य का असर भद्देपन की किस हद तक हुआ है। उनकी आँख जम नही रही थी। आँखो के लाल डोरो में, रौव की जगह को सकोच ने पकड लिया था। वहाँ के उपस्थित लोगो के जी मे वही वाक्य बार-बार और ज़ोर के साथ चक्कर काट रहा था। आँखें सबकी गङ्गाधरराव के दूल्हा वेश पर जा रही थी और मन के मना करने पर भी आँखें उसी वाक्य को दोहरा रही थी। उस मकान की भरप के भीतर का नृत्य वन्द हो गया था। उन अभिनेत्रियो की आँखो पर भी वही वाक्य सवार था। जूही ने धीरे से मोतीबाई से कहा, 'असली राजा तो झासी को अब मिला वाई जी।' मोतीबाई ने आँख तरेर कर जूही का हाथ दबाया, 'राजा सुनेंगे तो गर्दन काटकर फिकवा देगे। खबरदार।' 'मैने तो आपसे कहा,' जूही बोली, 'आपके हाथ जोडती हू किसी को मेरी बात मालूम न होने पावे।