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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 526 में से

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पृष्ठ 83

७२ झांसी की रानी फिर ये सब झरपो के पास खडी होकर जो कुछ दूसरी ओर हो रहा था, देखने-सुनने लगी । गङ्गाधर, विजयबहादुर से बोले, 'आपने मुगलखाँ का ध्रुवपद सुना ?' विजयबहादुर ने कहा, 'पहले भी सुना है । इनकी होरी भी सुनी है । परन्तु दुर्गा का नाच मुझको बहुत भाया ।' मुगलखा की आँख बदल पडी, परन्तु उसने सिर नीचा कर लिया गङ्गाधरराव ने देख लिया । वे बोले, मुगलखा ताव खाने पर बहुत अच्छा गाता है । अब सुनियेगा । इसके ध्रुवपद का मुकाबिला कही हैं ही नही । नृत्य अपनी जगह अच्छा है, परन्तु मुगलखाँ का ध्रुवपद राजा है और दुर्गाबाई का नाच उसका चाकर ।' मुगलखाँ हर्ष के मारे फूल गया । आँखो मे आसू छलक आये । उनको जल्दी पोछकर हाथ जोडकर खडा हो गया । बोला, 'श्रीमन्त सरकार का हुकुम हो तो लखनऊ वाली बात सुना दूँ ।' मनू के उस वाक्य से गङ्गाधरराव को छुटकारा नही मिल रहा था । उनको विश्वास था कि उपस्थित लोग भी उसमे उसी प्रकार उलझे होगे । प्रतिघात से उमग की एक लहर उठी और उन्होने मूगलखाँ से कहा, 'महाराजा साहब को ज़रूर सुनाओ और फिर गाओ । बैठकर सुनाओ ।' मुगलखा की बात सुनने के लिये वहाँ सन्नाटा छा गया । मुगलखा ने कहा, 'सरकार मैं गाने के लिये लखनऊ गया । वहाँ के गवैयो ने सलाह करली कि मैं नवाब साहब के सामने पहुच ही न पाऊँ । इसलिये उन्होने कहा, 'पहले हमको सुनाओ । समझेगे कि उस्ताद हो, तो नवाब साहब के सामने पेश कर देगे, वरना अपने वनखड को वापिस जाना । मै अपने देश के कपडे पहिने था । पहले तो उसका मज़ाक उडाया गया, बुन्देलखण्ड्डी है । क्या ऊल-जलूल साफा वाघे है ! जूते आपके-माशा-अल्लाह ! दाढी बुन्देलखण्ड के रीछो जैसी ! बातचीत जङ्गलियो सी ! बर्ताव ठीक भेडियो का ! इत्यादि सुनते सुनते कलेजा

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