झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई · ७३ पक गया। फिर मैंने गाया। जो कुछ गाने के बाद हुआ उसको मैं कह नही सकता।' गंगाधरराव उत्साह के साथ बोले, 'मैं बतलाता हू महाराजा साहबं। जब उस्ताद ने आठो अङ्ग सहित ध्रुवपद सुनाया तब सच्चे स्वरो की वर्षा हो उठी, निन्दा करने वाले उसमें बह गये। उस्ताद के उन लोगो ने पैर छुये और इनको नवाब साहब के सामने पेश किया। नवाब साहब स्वय संगीत के बडे जानकार हैं। उस्ताद को काफी इनाम दिया। बुन्देलखण्ड को उन्होने जी खोलकर सराहा।' फिर मुगलखा ने तल्लीन होकर गाया। लगभग सारी जनता मुग्ध हो गई। राजा विजयबहादुर इस अवसर पर पुरस्कार बांटने के लिये अपने साथ काफी रुपया लाये थे। सनक तो सवार थी ही, अपने बख्शी से बोले, 'मुगलखा के साफे मे जितने रुपये आवे दे दो, तबले वाले के तबलो में चाहे फोडकर चाहे वैसे ही भरदो। सारङ्गी वालो की सारङ्गी में रुपये ठूंस दो। दुर्गा जितना बोझ बांध ले उतना बाध लेने दो।' इस आज्ञा के सुनते ही अनेक वाद्य वाले खडे हो गये। इनमें से एक शहनाई वाला भी था उसकी शहनाई में बहुत थोडे रुपये जा सकते थे। इसलिये गुस्से में आकर उसने शहनाई तोड डाली। बोला, 'सरकार ऐसा बाजा किस काम का जो रुपये का मेल न खा सके।' राजा विजयबहादुर ने उसकी शहनाई को सोने से भरने का आदेश किया। उस युग की प्रथा के अनुसार उस दिन सबको कुछ न कुछ दिया। गया। रात को नाटक हुआ। बहुत अच्छा। विजयबहादुर ने नाटकशाला से सम्बन्ध रखने वाले सब लोगो को काफी इनाम दिया। विवाह की समाप्ति पर दरबार हुआ। नजर-न्योछावरे हुई। पुरस्कार बँटे। बडे बडे सरदारो की नज़र-न्योछावरो के उपरांत छोटे जागीरदारो की बारी आई। एक मऊ का जागीरदार अपने को आनन्दराय कहते हुये