भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

७४ झांसी की रानी आगे बढा । राजा थकावट के मारे खीझ उठे थे । आनन्दराय ने अपने कुटुम्ब और अपनी सेवा का बखान करते हुए रामचन्द्रराव वाली घटना का वर्णन भी शुरू कर दिया । राजा खिसिया उठे । बोले, 'में भी स्मरण किए हूं । तुम्हारी दास्तान पर यहा कोई काव्य या रायसा नही लिखा जाने वाला है । नजर करने के बाद अपनी जगह जा बैठो । तुमको जो मिलना होगा मिल जावेगा ।' आनन्दराय नजर-न्योछावर करके एक कोने मे सिमट गया । अवस्था अधेड हो गई थी, परन्तु शरीर अब भी बलिष्ठ था । अपने को अपमानित हुआ समझकर बार बार उसास ले रहा था—और छाती फुला रहा था । वह एक निश्चय पर पहुँचा । जैसे ही राजा के सामने जरा भीडभाड देखी वहां से खिसक गया । राजा के कर्मचारी नजर-न्योछावरो का व्योरा भेट करने वालो के नाम-पते सहित लिखते जा रहे थे । भेट करने वालो को पलटे में पुरस्कार भी बाटने थे, इसलिए, और हिसाब रखने के लिये भी । जब पुरस्कार बाटते बाटते आनन्दराय की वारी आई तब वह गैर- हाजिर था । दरबार के निकट ही रनवास के लिये झरपे लगी थी । रानी भी वहा बैठी थी । 'कहा चला गया आनन्दराय ?' राजा ने पूछा । थोडी सी तलाश करने के बाद वह नही मिला । फिर और लोगो की हाजिरी होती रही । इस रस्म की समाप्ति पर वहा के सब लोगो ने जयजयकार किया । 'महाराजा गगाधरराव की जय' 'महारानी लक्ष्मीबाई की जय' विवाह के उपरान्त ससुराल में आने पर मनू का नाम उसी दिन महाराष्ट्र और बुन्देलखण्‍ड की प्रथा के अनुसार लक्ष्मीबाई रक्खा गया था ।