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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ७५ दरबार की समाप्ति के कुछ समय उपरात रानी लक्ष्मीबाई—अब मनू नही कहा जावेगा—किले के महल के अपने कक्ष में सुन्दर, मुन्दर और काशी के साथ थी। उनको अपनी सब सहचारियो में ये तीन सबसे अधिक प्यारी लग उठी थीं। रानी ने कहा, 'आज एक बात अच्छी नही हुई। आनन्दराय नाम के उस जागीरदार की अवहेलना की गई।' मुन्दर बोली, 'सरकार को कैसे नाम याद रह गया ? और इतने हल्ले गुल्ले और भीड भाड की ध्वनियो मे यह घटना कैसे स्मरण रही ?' रानी ने कहा, 'मैने देख लिया है कि बुन्देलखण्ड पानीदार देश है। इस पानी को बनाये रखने की हमको ज़रूरत है। उस आदमी का पानी उतारा गया—यह बुरा हुआ।' काशी बोली, 'छोटे छोटे से आदमियो का महाराज कहा तक लिहाज करे ? थक भी तो बहुत गये आज। सुना है नाटकशाला भी नही जायगे।' रानी ने कहा, 'जिन्हे तुम छोटा आदमी कहती हो, आधार तो हमारे वे ही हैं।