झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ झांसी की रानी [ १६ ] विवाह होने के पहले गगाधरराव को, शासन का अधिकार न था। उन दिनो झासी का नायब पोलिटिकल एजेण्ट कप्तान डनलप था। वह राजा के पास आया-जाया करता था। 'लोग कहते थे कि दोनो, में मैत्री है। गगाधरराव अधिकार प्राप्त करने का प्रयत्न पहले से कर रहे थे। विवाह के उपरान्त उनको अधिकार मिल गया। परन्तु अधिकार मिलने के पहले कम्पनी सरकार के साथ फिर एक अहदनामा हुआ। पुरानी बाते पुष्ट की गई। केवल एक बात नई हुई—झाँसी में एक अङ्गरेजी फौज रक्खी जावेगी अङ्गरेजी हुकूमत मे, पर खर्चा झासी का राज्य देगा। गंगाधरराव को मानना पडा। मनको खटका। उन्होने नकद खर्चा न देकर कम्पनी सरकार का आग्रह निभाने के लिये झासी के राज्य से २ लाख २७ हजार चारसौ अट्ठावन रुपये वार्षिक आय का एक इलाका इन राज्य लोलुपो को दे दिया। जब यह सब हो गया तब गगाधरराव को शासन का अधिकार मिल पाया। इसके बाद दरबार हुआ। खुशियां मनाई गई। 'खेल-कूद, नाटक इत्यादि हुये, परन्तु अनेक झासी निवासियो को उनमें खोखलापन ही दिखलाई पडा। उनको अपने प्रदेश का खण्डित होना कसका। स्वय राजा को नाटकशाला मे यथेष्ट मनोरञ्जन नही मिल सका। वे शीघ्र वहा से चले आये और रंगमहल में रानी के पास पहुचे। रानी किले वाले महल मे ही प्राय. रहती थी। बाहर बहुत कम निकल पाती थी। जब निकलती तब पर्दे की कैद में। इसलिये सवारी, व्यायाम इत्यादि किले वाले महल के इर्दगिर्द आड ओट से कर पाती थी। तो भी वे काफी समय इन बातो में लगाती थी और अपनी समग्र सहेलियो तथा किले के भीतर रहने वाली स्त्रियो को सवारी, शस्त्र-प्रयोग मलखव, कुस्ती का अभ्यास कराती थी। बचे हुये समय में धार्मिक-ग्रन्थो