झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ७७ परम श्रद्धा थी। बाल्यावस्था को पार कर यौवन मे पदार्पण करने को थी परन्तु नये नये वस्त्र, कीमती आभूषणो का शौक न करके उनकी धुन ऊपर लिखी बातो की ओर अधिक रहती थी। झासी आने के बाद चपल, सुखी मनू मे एक परिवर्तन धीरे धीरे घर करता जा रहा था - वे अब उतना नही बोलती थी। रानी लक्ष्मीबाई मे गम्भीरता जगह करती जा रही थी और क्रुद्ध हो जाने की वृत्ति तो और भी अधिक शीघ्रता के साथ घुलती चली जा रही थी। व्यंग करने की इच्छा ज़रूर कुछ बढती पर थी, परन्तु वह सहज, सरल भव्य, दिव्य मुस्कान सदा साथ रही। और चित्त की दृढता तो पूर्व जन्मो से सचित होकर मानो छठी के दिन ही ब्रह्मा ने पूरी समूची उनके हिस्से में रख दी थी। रंगमहल में आने पर रानी ने गगाधरराव का सत्कार जैसा कि हिन्दू नारी—और रानी—कर सकती है, किया। राजा अपने भावो को छिपा पाने में असमर्थ थे। उनको इसका अभ्यास न था। चेहरे पर रुखाई थी और आखो में उदासी। रानी ने कहा, ‘आज आप नाटकशाला से जल्दी लौट आये। खेल अच्छा नही हुआ क्या?’ राजा बोले, ‘खेल तो सदा अच्छा होता है। मन नही लगा। एक नये खेल की तैयारी के लिये कह आया हूँ।’ रानी—‘कौन सा?’ राजा—‘मृच्छकटिक।’ रानी—‘यह क्या है?’ राजा—‘शूद्रक कवि ने संस्कृत में लिखा है। मैने हिन्दी में उलथा करवाया है। चारुदत्त ब्राह्मण और वसन्तसेना के प्रेम की अद्भुत कहानी है। आप देखने चलोगी?’ रानी—‘न।’