भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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७८ झांसी की रानी राजा—'घोडे की सवारी, कुश्ती, मलखंब के सिवाय आपको और भी कुछ पसन्द है या नही ?' रानी—'अवश्य । सहेलियो को अपना सा बनाना । उनको अवसर कुअवसर पडे पुरुषो की सहायता करने में पीछे पैर न देने की सीख देना, घर की सफाई, स्वच्छता इत्यादि बनाये रखना, काफी काम हैं।' राजा—'इन सबो को मोटा-तगडा बनाकर आप क्या करने जा रही हैं ?' रानी—'अभी तो मुझको भी नही मालूम । पर देह और मनको सबल बना लेना क्या कोई कम महत्व का काम है ?' राजा—'व्यर्थ है। घर का ही इतना काफी काम स्त्रियो के लिये ससार में है कि उनको घुडसवारी इत्यादि की ओर खीच ले जाना फूहड बनाना है।' रानी—'और नाचना-गाना ?' राजा—'अकेले मे सभी स्त्रिया नाचती-गाती हैं। परन्तु यदि वे इन विद्याओ को ढङ्ग से सीखे तो शरीर और मन दोनो के लिये काफी कसरत पा सकती हैं।' रानी—'हा स्वराज्य स्थापित है। अब सिवाय हंसने-खेलने के नर-नारियो के लिये और काम ही क्या बचा है ? देखिये न किस आराम के साथ झासी-राज्य का पचमाश से अधिक अङ्गरेजो के हाथ में दे दिया गया। आपका वह मित्र गार्डन भी नाटकशाला में आता होगा ?' राजा—'अङ्गरेज लोग खूब हँसते-खेलते और नाचते-गाते हैं...’ रानी—'और नाचते-गाते ही पूरे हिन्दुस्तान को रोदते चले जाते हैं। खेल तो बढिया है।' राजा—'हमारे यहा फूट है। गाव गाव में उपद्रवी, डाकू और बटमार भरे हुये हैं। अङ्गरेजो के पास हथियार अच्छे हैं। इसलिये उन्होने राज्य कायम कर लिया।'