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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ७६ रानी—‘नाटकशाला में जो हथियार बनते हैं, उनसे क्या अङ्गरेज नही हराये जा सकते हैं ?’ राजा को यह व्यंग अखर गया । पर जिस मुस्कान के साथ वह निसृत हुआ था वह आकर्षक थी । साथ ही मोतीबाई, जूही इत्यादि कल्पना में बिजली की तरह कौध गई और आगे आने वाले मृच्छकटिक नाटक के अभिनय ने एक उमङ्ग पैदा की, रानी की मुस्कान का आकर्षण उसी क्षण तिरोहित हो गया और उसके साथ ही उठता हुआ क्षोभ । बोले, ‘आप कभी-कभी बहुत कडी चोट कर बैठती हैं ।’ रानी ने अदम्य भाव से कहा, ‘आपके यहा के भाट क्या केवल प्रशंसा और यशगान ही करते हैं या कभी कभी कडखा भी सुनाते हैं ?’ राजा का क्षोभ उभडा, परन्तु उन्होने वहा का वही दबाने का प्रयत्न किया और विषयान्तर करते हुए बोले, ‘हमारे यहा कवि, चित्रकार इत्यादि अनेक कलाकार हैं ।’ रानी ने भी बात न बढ़ाते हुये पूछा, ‘कवि कौन हैं और क्या करते हैं ?’ राजा ने उत्तर दिया, ‘एक हृद्येश है । अच्छा कवि है । एक पजनेश है । रङ्गीन है । कहता अच्छे ढङ्ग से है । ‘ये लोग क्या लिखते हैं ?’ ‘राधागोविन्द का प्रेमवर्णन, नखशिख नायिकाभेद ।’ ‘नखशिख नायिकाभेद क्या ?’ ‘राधा या गोपियो की चोटी से लेकर एडी तक का कोमल वर्णन । यह नखशिख हुआ । नाना प्रकार की सुन्दर स्त्रियो की वृत्तियो का विविध वर्णन, यह नायिका भेद है ।’ ‘अर्थात् स्त्रियो के पूरे शरीर की सूक्ष्म जाच-पडताल-और, इस काम के लिये इन लोगो को इनाम-पुरस्कार भी दिये जाते होगे ?’

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