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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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८० झांसी की रानी राजा जरा झेंपे, परन्तु सहमे नही। बोले, 'इस प्रकार की कविता करने में बहुत विद्वत्ता और मिहनत खर्च करनी पडती है। इसलिये उनको पुरस्कार दिया जाता है। वे लोग राजदरबारो की शोभा हैं।' रानी ने फिर उसी मुस्कराहट के साथ पूछा, 'भूषण को छत्रपति शिवाजी क्या इसी तरह की कविता के लिये बढावा दिया करते थे? भूषण तो दरबार की शोभा रहे न होगे?' राजा इस व्यङ्ग से कुढ गये और क्षोभ को दबा न सके। बोले, 'आप हमेशा छत्रपति, और पन्तप्रधान बाजीराव और न जाने किन-किन का नाम दिन रात रटा करती हैं। मैंने कई बार कहा कि इन बातो की छेडछाड में अब कोई सार नही।' रानी ने कहा, 'मै भी तो विनती किया करती हू कि उन बातो को बतलाइये जिनमें सार हो।' राजा—'आप राज्य का प्रबन्ध करना सीखिये। मैं भी इस ओर ध्यान देता हूँ। अच्छी व्यवस्था बनी रहेगी तो राज्य बचा रहेगा अन्यथा अङ्गरेज फिर इसको अपनी देख रेख मे ले-लेगे—या शायद राज्य को खत्म करके अपना अधिकार बर्तने लग जावे।' रानी—'उस समय क्या नाटकशाला वाले किसी काम न श्रावेगे?' राजा के हृदय में आग लग गई। कुछ कहना चाहते थे कुछ कह गये, 'आपके मन में हठ, नगर-कोट बाहर घोडे पर घूमने का है और सखी सहेलिया भी जगल-टोरियो पर साथ मे घोडे कुदाये तो इससे बढकर न राज्य है, न राज्य प्रबन्ध और न विचारी नाटकशाला। ठीक है न?' रानी के ऊपर उनके क्रोध का कोई प्रभाव नही पडा। बोली, मेरे आपके—दोनो के—लिये वह विशाल महल क्या कम है?' राजा पर इस व्यग की चोट पड गई, पर वे गुस्से को पीने लगे। कुछ सोचकर पूछा, 'क्या सचमुच आपको नाटकशाला का मेरा मनोरञ्जन नापसन्द है?'