भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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१०२ रसरत्नसमुच्चये—

ऐतिहासिक वृत्त का ब्योरा अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है । सम्भवतः इस तत्त्व का ज्ञान भ्रमणशील रसायन प्रेमियों ने ज्वालामुखी, उष्णस्रोत तथा गोदन्ती के क्षेत्र प्रभृति प्रदेशों में उग्र गन्ध और ज्वलनशक्ति देखकर अन्वेषण किया हो इसी लिये प्राचीन आर्य रसायन ग्रन्थों में "गन्धक" नाम से ही इसका अभिधान किया गया है। गन्धक की उत्पत्ति के प्रकरण में लिखा है कि:—

निजगन्धेन तान्सर्वान् हर्षयन्दैत्यदानवान् ।
ततो देवगणैरुक्तं गन्धकाख्यो भवत्वयम् ॥

इसी प्रकार पाश्चात्य वैज्ञानिक साहित्य में ज्वलन शक्ति के कारण इसको सल्फर ( Sul = sal = salt Fur = fire ) अर्थात् ज्वलन-शील-लवण के अभिधान से सम्बोधित किया है ।

उपलब्धि—

गन्धक प्रायः ज्वालामुखी प्रदेशों में स्वतन्त्र दशा में पाया जाता है । मिस्चरलिच ( Mitscherlich ) नामक विद्वान् ने सर्व प्रथम योरोप में गन्धक की अनेक प्रकार की परिवर्तित रासायनिक दशाओं का प्राप्त करने का प्रयत्न किया था । गन्धक का प्रयोग भारतवर्ष में अति प्राचीन काल से किया जा रहा है । रस ग्रन्थों के अवलोकन से विदित होता है कि आर्यरसायन-विज्ञों ने भी ब्योरेवार इसके रासायनिक परिवर्त्तन और गुणों का अध्ययन किया तथा उसका औषधि में उपयोग कर जन समुदाय का बड़ा उपकार किया था । किन्तु इस ब्योरे से यह प्रगट नहीं होता कि गन्धक का क्रमबद्ध अध्ययन करने वाला महापुरुष कौन था और किस समय में वह वर्तमान रहा। यह ऐतिहासिक वृत्त अन्वेषणीय है ।

गन्धक उन थोड़े से मूलतत्त्वों में गिना जाता है जो प्रकृति में स्वतन्त्र रूप से पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं यह प्रशान्त वा प्रज्वलित ज्वालामुखी प्रदेशों में आधिक्य से प्राप्त होता है । योरोप में इटली ( Italy ), सिसली (Sicily), आइस-लेन्ड ( Iceland ) आदि देशों में बहुतायत से मिलता है । असाधारणतया अन्य खनिजों के साथ में भी यह यौगिक रूप में पाया जाता है । कहीं २ हाइड्रोजन गेज़ के साथ सल्फ्यूरेटेड हाईड्रोजन ( Sulphurated Hydrogen ) के रूप में उष्ण स्रोतों में पाया जाता है । ऐसे स्रोत बद्रीनाथजी की यात्रा के मार्ग में प्रायः देखे जाते हैं । अन्यत्र भी भारतवर्ष के विहार, बङ्गाल, आसाम, मद्रास आदि प्रान्तों में तीर्थों के स्थानों में प्रायः ऐसे उष्ण स्रोत मिला करते हैं । ऐसे स्रोतों में गन्धक की उग्र गन्ध होती है ।

यौगिक-गन्धक सल्फाइड ( Sulphide ) के रूप में अनेक खनिजों के साथ में मिला रहता है उनमें से प्रधान निम्न लिखित समझे जाते हैं ।

१ रौप्यमाक्षिक ( Iron pyrites ) लौहमाक्षिक ।