भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

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१२६ रसरत्नसमुच्चये-

नाशयेदामपूर्तिं च विरेच्य क्षणमात्रतः ॥ १२३ ॥
कङ्कुष्ठ को एक यव के प्रमाण से मलरोधक जीरक सोंठ आदि के साथ विरेचन के लिये सेवन करना चाहिए। इससे दस्त होकर आमदोष नष्ट होजाता है॥ १२३ ॥

ताम्बूलानुपानवर्जनम्—
भक्षितः सह ताम्बूलैर्विरेच्यासून्विनाशयेत् ॥ १२४ ॥
इसको ताम्बूल के साथ सेवन करने से इतने दस्त आते हैं कि प्राणतक के निकलने का भय रहता है ॥ १२४ ॥

अथ विषनाशार्थं कङ्कुष्ठप्रयोगविधिः—
बर्बूरीमूलिकाक्वाथो जीरसौभाग्यकं समम् ।
कङ्कुष्ठविषनाशाय भूयो भूयः पिबेन्नरः ॥ १२५ ॥
इत्युपरसाः ।

अशुद्ध कंकुष्ठ के विष को नष्ट करने के लिये या ज्यादा होने वाली दस्तों को रोकने के लिये बबूर की जड़ के काथ में जीरा और टङ्कण समान २ डालकर बार २ पान करना चाहिए या बर्बुरी = वनतुलसी और मूलिका के काथ में समान भाग जीरा और सुहागा डालकर पान करना चाहिए ॥ १२५ ॥

अथ साधारणरसपरिगणनम्—
कम्पिल्लश्चपलो गौरीपाषाणो नवसारकः ।
कपर्दो वह्निजारश्च गिरिसिन्दूरहिङ्गुलौ ॥ १२६ ॥
मृद्दारशृङ्गमित्यष्टौ साधारणरसाः स्मृताः ।
रससिद्धिकराः प्रोक्ता नागार्जुनपुरःसरः ॥ १२७ ॥
कबीला, सखिया, नौसादर, कौड़ी, अम्बर, सिन्दूर, हिङ्गुल, मृदारशृङ्ग ये नागार्जुनादिग्रन्थकारों के मत से रससिद्धिप्रदान करने वाले आठ साधारण रस हैं॥ १२६-१२७॥

अथ कम्पिल्लः—
इष्टिकाचूर्णसङ्काशश्चन्द्रिकाढ्योऽतिरेचनः ।
सौराष्ट्रदेशे चोत्पन्नः स हि कम्पिल्लकः स्मृतः ॥ १२८ ॥
कबीला ईंट के चूर्ण की तरह लाल और चमकदार होता है । यह अत्यन्त रेचक होता है । यह सौराष्ट्रदेश में खानों से उत्पन्न होता है ॥ १२८ ॥

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