भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

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३३२ रसरत्नसमुच्चये—

अथ गिरिसिन्दूरनिरूपणम्—

महागिरिषु चाल्पीयः पाषाणान्तः स्थितो रसः ।
शुष्कशोणः स निर्दिष्टो गिरिसिन्दूरसंज्ञया ॥ १४५ ॥

हिमालय, विन्ध्याचल आदि बड़े २ पहाड़ों की चट्टानों के बीच में जो लाल चूर्ण का रस सूख जाता है उसको गिरि सिन्दूर नाम से कहते हैं ॥ १४५ ॥

गिरिसिन्दूरगुणाः—

त्रिदोषशमनं भेदी रसबन्धनमग्रिमम् ।
देहलोहकरं नेद्यं गिरिसिन्दूरमीरितम् ॥ १४६ ॥

यह त्रिदोष की शान्ति करता है, दस्तावर है और रसबन्धन करने वाले द्रव्यों में श्रेष्ठ है तथा देह को लौह सदृश दृढ़ करता है और नेत्र हितकर है ॥ १४६ ॥


अथ हिङ्गुलनिरूपणम्—

हिङ्गुलभेदाः—

हिङ्गुलः शुकतुण्डाख्यो हंसपादस्तथापरः ॥ १४७ ॥

हिङ्गुल दो तरह का होता है, एक को शुकतुण्ड और दूसरे को हंसपाद, कहते हैं ॥ १४७ ॥

शुकतुण्डकस्य परिचयः—

प्रथमोऽल्पगुणस्तत्र चर्मारः स निगद्यते ॥ १४८ ॥

इन दोनों में जो शुक तुण्ड हिङ्गुल होता है वह अल्प गुणप्रद होता है इसको चर्मार भी कहते हैं ॥ १४८ ॥

हंसपादलक्षणम्—

श्वेतरेखः प्रवालाभो हंसपादः स ईरितः ॥ १४९ ॥

जिस हिंगुल का रंग प्रवाल के समान होता है तथा श्वेत रेखाएं पड़ी होती हैं उसे हंसपाक (द) कहते हैं ॥ १४९ ॥

हिङ्गुलगुणाः—

हिङ्गुलः सर्वदोषघ्नो दीपनोऽतिरसायनः ।
सर्वरोगहरो वृष्यो जारणायातिशस्यते ॥ १५० ॥
एतस्मादाहृतः सूतो जीर्णगन्धसमो गुणैः ॥ १५१ ॥

हिङ्गुल सब दोषों को नष्ट करता है, अग्नि दीपक और रसायन गुण को करता