रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें- तृतीयोऽध्यायः । १३३
है, सर्व रोगों को हरता है, वृष्य है, धातुओं के जारण में श्रेष्ठ है, इससे निकाला हुआ पारद गुणों में गन्धकजीर्ण पारद के समान होता है ॥१५०-१५१॥
अथ शोधनम्— सप्तकृत्वाऽऽर्द्रकद्रवैर्लकुचस्याम्बुनाऽपि वा । शोषितो भावयित्वा च निर्दोषो जायते खलु ॥ १५२ ॥ किमत्र चित्रं दरदः सुभावितः क्षीरेण मेष्या बहुशोऽम्लवर्गैः । एवं सुवर्णं बहुघर्मतापितं करोति साक्षाद्वरकुङ्कुमप्रभम् ॥ १५३ ॥ हिङ्गुल को अद्रक के रस की सात भावना देने से वह शुद्ध हो जाता है अथवा व डहल के रस की सात भावना से भी शुद्ध हो जाता है। अथवा हिङ्गुल को भेड़ के दुग्ध से और अम्ल वर्ग के पदार्थों के रस से बहुत वार भावना देकर सेवन करने से मनुष्य को कुङ्कुम (केशर) के समान कान्तिमान् और अच्छे वर्ण युक्त कर देता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। अथवा इस प्रकार भावित हिङ्गुल बहुत वार अग्नि में तप्त हुए सुवर्ण तथा केशर के समान देह को कान्ति युक्त कर देता है ॥ १५२-१५३ ॥
हिङ्गुलसत्त्वाकर्षणविधिः— दरदः पातनायन्त्रे पातितश्च जलाश्रये । तत्सत्त्वं सूतसङ्काशं जायते नात्र संशयः ॥ १५४ ॥ हिङ्गुल को शुद्ध कर अधःपातन यन्त्र की ऊर्ध्व हण्डि में लेपकर नीचे की हण्डिका में जलभर कर एक हस्त परिमित गड्ढे में उस यन्त्र को रख दें ऊपर फिर से अग्नि जलाने से पारद के समान सत्त्व नीचे के जल में गिर जायगा । इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ १५४ ॥
अथ मृदारशृङ्गकम्— परिचयः— सदलं पीतवर्णं च भवेद्गूर्जरमण्डले । अर्बुदस्य गिरेः पार्श्वे जातं मृदारशृङ्गकम् ॥ १५५ ॥ गुजरात प्रान्त में आबु पहाड़ के समीप की खानों से पत्र रचना युक्त और पीतवर्ण की वस्तु प्राप्त होती है उसको मुरदासंग कहते हैं ॥ १५५ ॥
अथ गुणाः— सीससत्त्वं गुरु श्लेष्मशमनं पुङ्गदापहम् ।