रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३६ रसरत्नसमुच्चये—
वैदूर्य्य, ये नवग्रहों की गणनानुसार उनके नौरत्न हैं अर्थात् इन रत्नों के धारण करने से या दान करने से वे ग्रह शान्त रहते हैं ॥ ६ ॥
| सूर्य, | चन्द्र | मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि, | राहु | केतु |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पद्मराग | मोती | मूंगा | पन्ना | पुखराज | हीरा | नीलम | गोमेद | वैदूर्य्य |
ग्रहानुसारेण रत्नपरिगणनम्— ग्रहानुमैत्र्या कुरुविन्दपुष्पप्रवालमुक्ताफलतार्क्ष्यवज्रम् । नीलाख्यगोमेदविदूरकं च क्रमेण मुद्राधृतमिष्टसिद्धयै ॥७॥
पद्मराग, पुखराज, प्रवाल, मोती, मरकत, हीरा, नीलम, गोमेद, वैदूर्य्य इन नवरत्नों की क्रम से सूर्यादि ग्रहों के साथ मित्रता होने से इनकी मुद्रा बनाकर धारण करना इष्टसिद्धि के लिये श्रेष्ठ है ॥ ७ ॥
रत्नप्रयोगविषयः— रसे रसायने दाने धारणे देवताऽर्चने । सुलक्षणानि सुजातीनि रत्नान्युक्तानि सिद्धये ॥ ८ ॥
उत्तम जाति और उत्तम लक्षण वाले रत्न रस, रसायन, दान, धारण, देवार्चन और इष्टसिद्धि के लिये उत्तम कहे गये हैं ॥ ८ ॥
अथ माणिक्यम्— द्विविधमाणिक्यनिर्देशः— माणिक्यं पद्मरागाख्यं द्वितीयं नीलगन्धि च ॥ ९ ॥
मणिक्य नाम का रत्न दो तरह का होता है, एक पद्मराग और दूसरा नील-गन्धि कहलाता है ॥ ९ ॥
श्रेष्ठमाणिक्यलक्षणम्— कुशेशयदलाच्छायं स्वच्छं स्निग्धं गुरु स्फुटम् । वृत्तायतं समं गात्रं माणिक्यं श्रेष्ठमुच्यते ॥ १० ॥
जो माणिक्य लालवर्ण के कमल के पत्रों के समान लाल वर्ण का हो तथा स्वच्छ, स्निग्ध, भारी, दीप्तिमान, गोल और विस्तृत तथा समानावयव युक्त हो वह श्रेष्ठ होता है और ये लक्षण पद्मराग माणिक्य में होते हैं ॥ १० ॥
श्रेष्ठनीलमाणिक्यलक्षणम्— नीलं गङ्गाम्बुसम्भूतं नीलगर्भारुणच्छवि ।