रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः। १३९
पूर्वमाणिक्यवच्छ्रेष्ठं माणिक्यं नीलगन्धि तत् ॥ ११ ॥ नीलमाणिक्य गङ्गा से उत्पन्न और बाहर से नीलवर्ण का तथा भीतर (मध्य) रक्त वर्ण का होता है, इसी को नीलगन्धि माणिक्य कहते हैं । यह भी पद्मराग-माणिक्य के समान ही उत्तम है ॥ ११ ॥
निकृष्टमाणिक्यलक्षणम्— रन्ध्रकार्कश्यमालिन्यरौक्ष्यावैशद्यसंयुतम् । चिपिटं लघु वक्रं च माणिक्यं दुष्टमष्टधा ॥ १२ ॥ जो छिद्रयुक्त, स्पर्श में कर्कश, मलिन, रूक्ष, अपारभासक, चिपटा, हलका और टेढा इन आठ दोषों से युक्त हो वह त्याज्य है ॥ १२ ॥
माणिक्यगुणाः— माणिक्यं दीपनं वृष्यं कफवातक्षयार्तिनुत् । भूतवेतालपापघ्नं कर्मजव्याधिनाशनम् ॥ १३ ॥ माणिक्य दीपन तथा वृष्य होता है और कफ, वात एवं क्षय रोग को नष्ट करता है, भूत से और वेताल की बाधाओं को दूर करता है। पाप और दुष्टकर्म से जन्य व्याधियों को नष्ट करता है ॥ १३ ॥
अथ मौक्तिकनिरूपणम्— प्रशस्तमौक्तिकलक्षणम्— ह्लादि श्वेतं लघु स्निग्धं रश्मिवन्निर्मलं महत् । ख्यातं तोयप्रभं वृत्तं मौक्तिकं नवधा शुभम् ॥ १४ ॥ जो मोती अवलोकन से चित्त प्रसन्न करता हो, श्वेत, लघु, स्निग्ध, चन्द्रकिरणसदृश किरणयुक्त, निर्मल, आकार में बड़ा, जल के समान स्वच्छ और गोल इन नव लक्षणों से युक्त हो वह सब कार्यों में शुभ माना जाता है ॥ १४ ॥
मौक्तिकशुक्त्योर्गुणाः— मुक्ताफलं लघु हिमं मधुरं च कान्ति- दृष्ट्यग्निपुष्टिकरणं विषहारि भेदि । वीर्यप्रदं जलनिधेर्जनिता च शुक्ति- र्दीप्ता च पक्तिरुजमाशु हरदेवैष्यम् ॥ १५ ॥ मौक्तिक लघु, शीतल, मधुर, कान्तिवर्धक, आंख की ज्योति को बढाने वाला,