भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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१३८ रसरत्नसमुच्चये—

अग्नि दीपक, शरीरपुष्टिकारक, विषनाशक, भेदक और वीर्य्य वर्द्धक होता है। समुद्र में पैदा हुई शुक्ति अग्नि को दीप्त करती है तथा परिणामशूल को अवश्य ही दूर करती है ॥ १५ ॥

हेयमौक्तिकम्—

रूक्षाङ्गं निर्जलं श्यावं ताम्राभं लवणोपमम् ।
अर्धशुभ्रं च विकटं ग्रन्थिलं मौक्तिकं त्यजेत् ॥ १६ ॥

जो मौक्तिक स्पर्श में रूक्ष, शीतलगुणरहित, मटमैला, ताम्र के स्वरूप का और नीमकसदृश धूसर, अर्धश्वेत, विषमाकार और गांठदार हो वह औषधकार्य में त्याज्य है ॥ १६ ॥

मौक्तिकगुणान्तरम्—

कफपित्तक्षयध्वंसि कासश्वासाग्निमान्द्यनुत् ।
पुष्टिदं वृष्यमायुष्यं दाहह्रतं मौक्तिकं मतम् ॥ १७ ॥

मोती (मुक्ताभस्म) कफ, पित्त, क्षय, कास, श्वास, अग्निमांद्य तथा दाह को नष्ट करता है, आयुष्य हितकर, वृष्य और शरीर पुष्टि कारक माना गया है॥१७॥

अथ प्रवालनिरूपणम्—

ग्राह्यप्रवालस्वरूपः—

पक्वबिम्बफलच्छायं वृत्तायतमवक्रकम् ।
स्निग्धमव्रणकं स्थूलं प्रवालं सप्तधा शुभम् ॥ १८ ॥

जो मूंगा पके हुए कुन्दरू ( तुण्डी ) के समान रक्त वर्णवाला गोल, लम्बा, वक्रतारहित, स्निग्ध, छिद्रशून्य और मोटा ऐसे नव(नो)लक्षणों से युक्त हो वह सर्वकार्यों में शुभ माना गया है ॥ १८ ॥

हेयप्रवालस्वरूपम्—

पाण्डुरं धूसरं रूक्षं सव्रणं कोटरान्वितम् ।
निर्भारं शुभ्रवर्णं च प्रवालं नेष्यतेऽष्टधा ॥ १९ ॥

जो मूंगा पाण्डुर ( श्वेतपीतमिश्रवर्ण ), धूसर ( श्वेतकृष्णमिश्रवर्ण ), रूक्ष, सच्छिद्र, कोटर ( खात ) युक्त, भाररहित, श्वेत, सूक्ष्म ( पतला ) इन आठ लक्षणों से युक्त हो वह अभीष्ट नहीं है ॥ १९ ॥