भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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चतुर्थोऽध्यायः ।
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प्रवालगुणाः—
क्षयपित्तास्रकासघ्नं दीपनं पाचनं लघु ।
विषभूतादिशमनं विद्रुमं नेत्ररोगनुत् ॥ २० ॥
प्रवालगुण— प्रवाल क्षय, रक्तपित्त और कास को नष्ट करती है और पाचकाग्नि को दीप्त करती है, भोजन को पचाती है, लघु है, विष, भूतबाधा तथा नेत्ररोग को दूर करती है ॥ २० ॥

अथ तार्क्ष्यम्—
प्रशस्ततार्क्ष्यलक्षणम्—
हरिद्वर्णं गुरु स्निग्धं स्फुरद्रश्मिचयं शुभम् ।
मसृणं भासुरं तार्क्ष्यं गात्रं सप्तगुणं मतम् ॥ २१ ॥
जो पन्ना हरे रङ्ग का, भारी, स्निग्ध, उज्ज्वलकिरण युक्त, दीप्तियुक्त, मसृण ( कोमल ) ओर स्थूल इन सात लक्षणों से युक्त हो वह शुद्ध है ॥ २१ ॥

अप्रशस्ततार्क्ष्यलक्षणम्—
कपिलं कर्कशं नीलं पाण्डु कृष्णं मलान्वितम् ।
चिपिटं विकटं रूक्षं लघु तार्क्ष्यं न शस्यते ॥ २२ ॥
जो पीतवर्ण, खुरदरा, नील, पाण्डु ( श्वेतपीतमिश्रितवर्ण ), काला, मैल युक्त, रूक्ष, चपटा, विषमाकार और लघु हो वह श्रेष्ठ नहीं है ॥ २२ ॥

तार्क्ष्यगुणाः—
ज्वरच्छर्दिविषश्वाससन्निपाताग्निमान्द्यनुत् ।
दुर्नामपाण्डुशोफघ्नं तार्क्ष्यमोजोविवर्धनम् ॥ २३ ॥
पन्ना के गुण:— यह ज्वर, वमन, विषबाधा, श्वास, सन्निपात्, अग्निमांद्य, अर्श, पाण्डु, सूजन इन रोगों को नष्ट करता है और ओज (बल) को बढ़ाता है ॥ २३ ॥

अथ पुष्परागः—
श्रेष्ठपुष्परागलक्षणम्—
पुष्परागो गुरुः स्निग्धः स्वच्छः स्थूलः समो मृदुः ।
कर्णिकारप्रसूनाभो मसृणश्च शुभोऽष्टधा ॥ २४ ॥
जो पुखराज गुरु, स्निग्ध, स्वच्छ, मोटा, समानाकार, कोमल, कर्णिकार