भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 362 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 230

१४० रसरत्नसमुच्चये—

( अमलतााल ) के पुष्प के समान कान्ति युक्त और मसृण इन आठ लक्षणों से सम्पन्न हो वह शुभ है ॥ २४ ॥

हेयपुष्परागलक्षणम्—
निष्प्रभं कर्कशं रूक्षं पीतश्यामं नतोन्नतम् ।
कपिशं कपिलं पाण्डु पुष्परागं परित्यजेत् ॥ २५ ॥
जो तेज हीन, खुरदरा, रूखा, पीला और काला, ऊंचा या नीचा विषमाकार, कालापन लिये भूरे वर्ण का और पाण्डुर हो वह त्याज्य है ॥ २५ ॥

पुष्परागगुणाः—
पुष्परागं विषच्छर्दिकफवाताग्निमान्द्यनुत् ।
दाहकुष्ठास्रशमनं दीपनं पाचनं लघु ॥ २६ ॥
पुखराज विषवाधा, वमन, कफ और वायु जन्यरोग, मन्दाग्नि, जलन, कुष्ठ और दूषितरक्त के विकारों को शान्त करता है और अग्नि को दीप्त करता है तथा पाचक और लघु होता है ॥ २६ ॥

अथ वज्रम्—
वज्रभेदाः—
वज्रं च त्रिविधं प्रोक्तं नरो नारी नपुंसकम् ।
पूर्वं पूर्वमिह श्रेष्ठं रसवीर्यविपाकतः ॥ २७ ॥
हीरा तीन प्रकार का होता है, १ नरजाति, २ नारी जाति, और ३ नपुंसक जाति । इन में पूर्व से पूर्व रस वीर्य्य और विपाक में श्रेष्ठ होता है ॥ २७ ॥

अथ पुंवज्रलक्षणम्—
अष्टास्रं वाऽष्टफलकं षट्कोणमतिभासुरम् ।
अम्बुदेन्द्रधनुर्वारितरं पुंवज्रमुच्यते ॥ २८ ॥
जो हीरा आठकोण या आठ धार वाला हो अथवा छः कोणवाला हो और तेज युक्त तथा इन्द्र के धनुष के समान प्रकाशमान और लघु हो वह नर जाति का हीरा होता है ॥ २८ ॥

स्त्रीनपुंसकवज्रयोर्लक्षणानि—
तदेव चिपिटाकारं स्त्रीवज्रं वर्तुलायतम् ।
वर्तुलं कुण्ठकोणाग्रं किञ्चिद्गुरु नपुंसकम् ॥ २९ ॥