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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

१४० रसरत्नसमुच्चये—

( अमलतााल ) के पुष्प के समान कान्ति युक्त और मसृण इन आठ लक्षणों से सम्पन्न हो वह शुभ है ॥ २४ ॥

हेयपुष्परागलक्षणम्—
निष्प्रभं कर्कशं रूक्षं पीतश्यामं नतोन्नतम् ।
कपिशं कपिलं पाण्डु पुष्परागं परित्यजेत् ॥ २५ ॥
जो तेज हीन, खुरदरा, रूखा, पीला और काला, ऊंचा या नीचा विषमाकार, कालापन लिये भूरे वर्ण का और पाण्डुर हो वह त्याज्य है ॥ २५ ॥

पुष्परागगुणाः—
पुष्परागं विषच्छर्दिकफवाताग्निमान्द्यनुत् ।
दाहकुष्ठास्रशमनं दीपनं पाचनं लघु ॥ २६ ॥
पुखराज विषवाधा, वमन, कफ और वायु जन्यरोग, मन्दाग्नि, जलन, कुष्ठ और दूषितरक्त के विकारों को शान्त करता है और अग्नि को दीप्त करता है तथा पाचक और लघु होता है ॥ २६ ॥

अथ वज्रम्—
वज्रभेदाः—
वज्रं च त्रिविधं प्रोक्तं नरो नारी नपुंसकम् ।
पूर्वं पूर्वमिह श्रेष्ठं रसवीर्यविपाकतः ॥ २७ ॥
हीरा तीन प्रकार का होता है, १ नरजाति, २ नारी जाति, और ३ नपुंसक जाति । इन में पूर्व से पूर्व रस वीर्य्य और विपाक में श्रेष्ठ होता है ॥ २७ ॥

अथ पुंवज्रलक्षणम्—
अष्टास्रं वाऽष्टफलकं षट्कोणमतिभासुरम् ।
अम्बुदेन्द्रधनुर्वारितरं पुंवज्रमुच्यते ॥ २८ ॥
जो हीरा आठकोण या आठ धार वाला हो अथवा छः कोणवाला हो और तेज युक्त तथा इन्द्र के धनुष के समान प्रकाशमान और लघु हो वह नर जाति का हीरा होता है ॥ २८ ॥

स्त्रीनपुंसकवज्रयोर्लक्षणानि—
तदेव चिपिटाकारं स्त्रीवज्रं वर्तुलायतम् ।
वर्तुलं कुण्ठकोणाग्रं किञ्चिद्गुरु नपुंसकम् ॥ २९ ॥

• चतुर्थोऽध्यायः। १४१

जो हीरा लम्बा, गोल और चपटा हो वह स्त्री जाति का है। जो हीरा गोल मुड़े कोण वाला और भारी हो वह नपुंसक जाति का होता है ॥ २९ ॥

जातिभेदेनाधिकारीभेदकथनम्— स्त्रीपुन्नपुंसकं वज्रं योज्यं स्त्रीपुन्नपुंसके ।
व्यत्यासान्नैव फलदं पुंवज्रेण विना क्वचित् ॥ ३० ॥

जो पुरुष जाति का हीरा हो उसका पुरुष के औषधि के लिये प्रयोग करें और स्त्री जाति का हीरा स्त्री जाति के लिये और नपुंसक जाति के हीरे को नपुंसक जाति के मनुष्य के लिए औषधार्थ प्रयोग करना चाहिये । पुरुष जाति हीरे को छोड़कर अन्य जाति के हीरों का प्रयोग भिन्न २ जाति में करने से लाभ नहीं होता है ॥ ३० ॥

वर्णभेदेनाधिकारीभेदकथनम्— श्वेतादिवर्णभेदेन तदेकैकं चतुर्विधम् ।
ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रं स्वस्ववर्णफलप्रदम् ॥ ३१ ॥
उत्तमोत्तमवर्णं हि नीचवर्णफलप्रदम् ।
न्यायोऽयं भैरवेणोक्तो पदार्थेष्वखिलेष्वपि ॥ ३२ ॥

प्रत्येक जाति का हीरा श्वेत, पीत, लाल, काला इन वर्ण भेदों से चार प्रकार का होता है और ये चारों वर्ण के हीरे क्रम से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन चार जातियों के कहलाते हैं । इनका उपयोग भी अपनी २ जाति में करना चाहिए । उत्तम वर्ण का हीरा नीच वर्ण के पुरुषों में प्रयोग करने से भी फलप्रद होता है किन्तु नीच वर्ण के हीरे को उत्तमवर्ण के पुरुषों में प्रयोग करने से निष्फल होता है । यह न्याय भैरव नाम के आचार्य के द्वारा सम्पूर्ण पदार्थों के विषय में बतलाया गया है ॥ ३२ ॥

अथ वज्रगुणाः— आयुष्प्रदं झटिति सद्गुणदं च वृष्यं
दोषत्रयप्रशमनं सकलामयघ्नम् ।
सूतेन्द्रबन्धवधसद्गुणकृत्प्रदीपनं
मृत्युञ्जयं तदमृतोपममेव वज्रम् ॥ ३३ ॥

हीरे के गुणः— यह आयु को बढ़ाता है, तत्काल ही शरीर में अनेक गुणों को

१४२ रसरत्नसमुच्चये—

उत्पन्न करता है, वृष्य है, वात-पित्त और कफ की शान्ति करता है, समग्र रोगों का नाश करता है, हीरक भस्म पारद के बन्धन, मारण और उसके गुणों को बढ़ाती है, अग्नि को दीप्त करती है, हीरा मृत्यु को नष्ट करता है। यह एक प्रकार का अमृत ही है ॥ ३३ ॥

रत्नदोषाः— ग्रासस्त्रासश्च बिन्दुश्च रेखा च जलगर्भता ।
सर्वरत्नेष्वमी पञ्च दोषाः साधारणा मताः ॥
क्षेत्रतोयभवा दोषा रत्नेषु न लगन्ति ते ॥ ३४ ॥

सब प्रकार के रत्नों में ग्रास, त्रास, बिन्दु, रेखा, जलगर्भता ये पांच दोष स्वाभाविक ही होते हैं, परन्तु खान और जल के दोष रत्नों में नहीं होते हैं ॥ ३४ ॥

अथ वज्रशोधनम्— कुलत्थक्वाथके स्विन्नं कोद्रवकथितेन वा ।
एकयामावधि स्विन्नं वज्रं शुध्यति निश्चितम् ॥ ३५ ॥

हीरे को एक प्रहर तक दोलायन्त्र द्वारा कुलत्थी या कोदोधान के क्वाथ में स्वेदन करने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ ३५ ॥

अथ वज्रमारणम्— वज्रं मत्कुणरक्तेन चतुर्वारं विभावितम् ।
सुगन्धिमूषिकामंसैर्वर्तितैः परिवेष्ट्य च ॥ ३६ ॥
पुटेत्पुटैर्वराहाख्यैस्त्रिंशद्वारं ततः परम् ।
ध्मात्वा ध्मात्वा शतं वारान्कुलत्थक्वाथके क्षिपेत् ।
अन्यैरुक्तःशतं वारान्कर्त्तव्योऽयं विधिः क्रमात् ॥ ३७ ॥

शुद्ध हीरे को खटमल के रक्त से चार वार भावित कर छूछूंदर के मांस में लपेट कर मूषा में बन्दकर ऊपर से कपड़ मिट्टी कर वाराह पुट की विधि से ३० पुट देवे' पश्चात् पुट से निकाल कर अग्नि में प्रतप्त कर कुलत्थ के काढ़े में १०० वार बुझावें । कुछ लोगों का मत है कि मत्कुण रक्त की भावना से लेकर प्रतप्त कर कुलत्थ क्वाथ में बुझाने तक जो विधि है उसे क्रम से सौ वार करना चाहिए॥३७॥

मतान्तरेण मारणम्— कुलत्थक्वाथसंयुक्तलकूचद्रवपिष्टया ।

चतुर्थोऽध्यायः । १४३

चतुर्थोऽध्यायः । १४३

शिलया लिप्तमूषायां वज्रं क्षिप्त्वा निरुध्य च ॥ ३८ ॥
अष्टवारं पुटेत्सम्यग्विशुष्कैश्च वनोत्पलैः ।
शतवारं ततो ध्मात्वा निक्षिप्तं शुद्धपारदे ॥
निश्चितं म्रियते वज्रं भस्म वारितरं भवेत् ॥ ३९ ॥
सत्यवाक् सोमसेनानिरेतद्वज्रस्य मारणम् ।
दृष्टप्रत्ययसंयुक्तमुक्तवान् रसकौतुकी ॥ ४० ॥

अथवा कुलत्थ क्वाथ और बड़हल के फलों के रस में मनःशिला को घोटकर पिष्टि बनालें, पश्चात् उस पिष्टि से मूषा को भीतर से लिप्तकर उसमें हीरे को रख कर मूषा का मुख बन्द कर के सुखा कर जंगली कण्डों की अग्नि में पुट देना चाहिए । इस तरह आठ पुट देकर हीरे को निकाल कर प्रतप्त करके शुद्ध पारद में १०० बार बुझाने से निश्चय ही वज्र की जल में तैरने लायक भस्म हो जाती है। यह हीरे की मारणविधि सत्य बोलने वाले और प्रत्यक्ष अनुभवी, रसक्रिया कौतुकी सोमसेनानी ने कही है ॥ ३८ ॥

मतान्तरेण मारणम्

विलिप्तं मत्कुणस्यास्रैः सप्तवारं विशोषितम् ।
कासमर्दरसापूर्णे लोहपात्रे निवेशितम् ॥ ४१ ॥
सप्तवारं परिध्मातं वज्रभस्म भवेत्खलु ।
ब्रह्मज्योतिर्मुनीन्द्रेण क्रमोऽयं परिकीर्तितः ॥ ४२ ॥
नीलज्योतिर्लताकन्दे घृष्टं घर्मे विशोषितम् ।
वज्रं भस्मत्वमायाति कर्मवज्ज्ञानवह्निना ॥ ४३ ॥

अथवा सात बार हीरे को खट्मल के रुधिर से लिप्तकर सुखा लें, पश्चात् हीरे को अत्यन्त तप्त कर कसौंदी के रस से पूर्ण लौहपात्र में बुझाना चाहिए । इस तरह सात बार तप्त कर बुझाने से हीरे की भस्म हो जाती है यह विधि ब्रह्मज्योति नाम के मुनियों के स्वामी ने कही है। अथवा केवल नीलापराजिता या ज्योतिष्मती या क्षीरकाकोली के कन्द के साथ हीरे को घोट कर धूप में सुखाने से जिस प्रकार सत्यज्ञान रूप वह्नि से कर्म नष्ट हो जाते हैं उसी प्रकार हीरे की भस्म हो जाती है, ॥ ४१–४३ ॥

१४४ रसरत्नसमुच्चये—

मतान्तरेण मारणम्—

मदनस्य फलोद्भूतरसेन क्षोणिनागकैः ।
कृतकल्केन संलिप्य पुटेद्विंशतिवारकम् ॥
वज्रचूर्णं भवेद्वर्यं योजयेच्च रसादिषु ॥ ४४ ॥
तद्वज्रं चूर्णयित्वाथ किञ्चिट्टङ्कणसंयुतम् ।
खरभूनागसत्त्वेन विंशेनावर्तयेद्ध्रुवम् ॥
तुल्यस्वर्णेन तद्ध्मातं योजनीयं रसादिषु ॥ ४५ ॥

अथवा मैन फल के रस में केञ्चुओं को पीसकर उनका हीरे पर लेपकर पुट देना चाहिए। इस तरह २० पुट देने से रसादि कार्यों में उपयोग करने लायक श्रेष्ठ भस्म हो जाती है। इस हीरक भस्म में थोड़ा सुहागा और बीसवें भाग की मात्रा में केञ्चुओं का सत्त्व मिलाकर घोट लें, फिर समान भाग सुवर्ण मिलाकर मूषा यन्त्र में फूंकने से हीरे का उत्तम रस तैय्यार हो जाता है, इसका रसादि कार्यों में प्रयोग करना चाहिए ॥ ३४-४५ ॥

अथ प्रयोगविशेषेण गुणविशेषकथनम्—

त्रिगुणेन रसेनैव सम्मर्द्य गुटिकीकृतम् ।
मुखे धृतं करोत्याशु चलदन्तविबन्धनम् ॥ ४६ ॥

हीरे की भस्म में त्रिगुण शुद्ध पारद मिलाकर घोट लें, फिर उसकी गोली बनाकर मुख में धारण करने से हिलते हुए दांत मजबूत हो जाते हैं ॥ ४६ ॥

अथ वज्ररसायनम्—

त्रिंशद्भागामितं हि वज्रभसितं स्वर्णं कलाभागिकं ।
तारं चाष्टगुणं सिताऽमृतवरं रुद्रांशकं चाभ्रकम् ।
पादांशं खलु ताप्यकं वसुगुणं वैक्रान्तकं षड्गुणं
भागोऽप्युक्तरसै रसोऽयमुदितः षाड्गुण्यसंसिद्धये ॥ ४७ ॥
इति वज्राधिकारः,

३० भाग हीरे की भस्म, १६ भाग सुवर्णभस्म, ८ भाग चांदीभस्म, ११ भाग शुद्ध मीठा विष या श्वेत पारद भस्म, ४ भाग अभ्रकभस्म, ८ भाग सुवर्णमाक्षिक भस्म और ६ भाग वैक्रान्त भस्म इन सबको खरल में कसोञ्जी आदि भेषज रसों के साथ घोट कर मात्रापूर्वक सेवन करने से षाड्गुण्य सिद्धि प्राप्त होती है ॥४७॥

चतुर्थोऽध्यायः । १४५

अथ नीलनिरूपणम्—नीलभेदाः—

जलनीलेन्द्रनीलं च शक्रनीलं तयोर्वरम् ॥ ४८ ॥
नीलम के जलनील और इन्द्रनील ये दो भेद हैं इन दोनों में इन्द्रनील उत्तम होती है, ॥ ४८ ॥

जलशक्रनीलयोःस्वरूपम्—

श्वैत्यगर्भितनीलाभं लघु तज्जलनीलकम् ।
कार्ष्ण्यगर्भितनीलाभं सभारं शक्रनीलकम् ॥ ४९ ॥
जो नील बीच में श्वेत हो और बाहर से नीलवर्ण युक्त हो और हलकी हो वह जलनील कहलाती है और जो मध्य में काले रङ्ग की हो और बाहर से अत्यन्त नील वर्ण युक्त हो तथा भारी हो वह इन्द्रनील कहलाती है ॥ ४९ ॥

श्रेष्ठनीललक्षणम्—

एकच्छायं गुरु स्निग्धं स्वच्छं पिण्डितविग्रहम् ।
मृदु मध्ये लसज्ज्योतिः सप्तधा नीलमुत्तमम् ॥ ५० ॥
जो नील एक सी छायावाली या अपने में अन्य वस्तु का प्रतिबिम्ब न बना सके, भारी, स्निग्ध, स्वच्छ, आकार में पिण्डस्वरूप हो और मृदु तथा दीप्त तेज युक्त इन सात लक्षणों से युक्त हो वह इन्द्रनील श्रेष्ठ है ॥ ५० ॥

श्रेष्ठनीललक्षणम्—

कोमलं विहितं रूक्षं निर्भारं रक्तगन्धि च ।
चिपिटाभं ससूक्ष्मं च जलनीलं हि सप्तधा ॥ ५१ ॥
जो नील कोमल, रूक्ष, भार रहित, लालवर्णयुक्त या रक्त की गन्ध आती हो, चपटी हो तथा अत्यन्त सूक्ष्म हो, तथा आधी में एक रङ्ग और आधी में अन्य रङ्ग हो, इस तरह सात लक्षण जिसमें हों वह जलनील कहलाती है ॥ ५१ ॥

अथ गुणाः—

श्वासकासहरं वृष्यं त्रिदोषघ्नं सुदीपनम् ।
विषमज्वरदुर्नामपापघ्नं नीलमीरितम् ॥ ५२ ॥
नीलम—श्वास, कास, त्रिदोष, विषमज्वर और अर्श को नष्ट करती है तथा


४७ वें श्लोक में कहे हुए षड्गुण—
गुणाः—विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिस्तत्परताक्रिया ।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य न साध्यमति वर्तते ॥ इति चरकः
रस० १०

१४६ रसरत्नसमुच्चये—

वृष्य और अग्निदीपक है। नील को शरीर में धारण करने से पाप भी नष्ट होते हैं॥५२॥

अथ गोमेदः—गोमेदधिरुक्तिः—

गोमेदः समरागत्वान्गोमेदं रत्नमुच्यते ॥ ५३ ॥

गायके मेद के समान वर्ण होने से या रत्नों के समान वर्ण होने से गोमेद को गोमेदरत्न कहते हैं ॥ ५३ ॥

प्रशस्तगोमेदलक्षणम्—

सुस्वच्छंगोजलच्छायं स्वच्छं स्निग्धं समं गुरु ।
निर्दलं मसृणं दीप्तं गोमेदं शुभमष्टधा ॥ ५४ ॥

जो अत्यन्त स्वच्छ और गोमूत्र के समान कान्ति युक्त हो, स्निग्ध तथा समानाकार हो, पत्ररचना रहित, मसृण, तोल में भारी तथा प्रकाशमान हो इस तरह आठ लक्षणों वाली गोमेद शुभ होती है ॥ ५४ ॥

हेयगोमेदलक्षणम्—

विच्छायं लघु रूक्षाङ्गं चिपिटं पटलान्वितम् ।
निष्प्रभं पीतकाचाभं गोमेदं न शुभावहम् ॥ ५५ ॥

जो गोमेद तेज रहित, लघु, स्पर्श में रूक्ष, चिपटाकार, पत्र रचना युक्त, प्रभारहित और पीले काच के समान हो वह अशुभ है ॥ ५५ ॥

अथ गुणाः—

गोमेदं कफपित्तघ्नं क्षयपाण्डुक्षयङ्करम् ।
दीपनं पाचनं रुच्यं त्वच्यं बुद्धिप्रबोधनम् ॥ ५६ ॥

गोमेद कफ, पित्त, पाण्डु, तथा क्षय को नष्ट करती है और दीपन, पाचन, रुचिवर्द्धक, बुद्धिप्रबोधक तथा चर्म हितकर है ॥ ५६ ॥

अथ क्षेपकश्लोकाः—
रत्नमारणनिषेधः—

रत्नानां शोधनं श्रेष्ठं मारणं न गुणप्रदम् ।
भस्मना वीर्यहानिः स्यात्तस्मात्तानि च शोधयेत् ॥ १ ॥

कुछ विद्वानों का मत है कि रत्नों का शोधन कर गुलाब पुष्पों के स्वरस (गुलाबजल) में घोट कर पिष्टि बनाकर प्रयोग करना चाहिए । इनकी भस्म करने से विशेष लाभ नहीं होता है अपि तु इन की भस्म बनाने से इन के प्रभाव की हानि होती है ॥ १ ॥

चतुर्थोऽध्यायः । १४७

चतुर्थोऽध्यायः । १४७

रत्नप्रयोगः— रसे रसायने दाने धारणे देवतार्चने । सुलक्ष्याणि सुजातीनि सर्वाण्युक्तानि शोधयेत् ॥ २ ॥ रत्नों का प्रयोग रस, रसायन, दान, धारण, देवताओं की पूजन में श्रेष्ठजाति और शुभलक्षणों वाले रत्नों का शोधन कर प्रयोग करना चाहिये ॥ २ ॥

रत्नानां साधारणशोधनम्— शुद्धिं चरन्ति रत्नानि निम्ब्वम्बुनि तुषाम्बुनि । विशुध्यन्ति त्रिदिवसैर्विधृतानि च सर्वशः ॥ ३ ॥ प्रायः सर्व प्रकार के रत्नों को निम्बू के स्वरस या काञ्जी में तीन दिन तक भींगों देने से वे अच्छी तरह शुद्ध हो जाते हैं ॥ ३ ॥

अथ वैदूर्यम्—श्रेष्ठवैदूर्यलक्षणम्— वैदूर्यं श्यामशुभ्राभं समं स्वच्छं गुरु स्फुटम् । अभ्रशुभ्रोत्तरीयेण गर्भितं शुभमीरितम् ॥ ५७ ॥ जो वैदूर्यमणि कालापन लिये हुए श्वेत, समानाकार, निर्मल, तौल में भारी, तेज युक्त और जिसके भीतर श्वेतरंग की रेखाएं हों वह उत्तम होती है ॥ ५७ ॥

हेयवैदूर्यलक्षणम्— श्यामं तोयसमच्छायं चिपिटं लघुकर्कशम् । रक्तगर्भोत्तरीयं च वैदूर्यं नैव शस्यते ॥ ५८ ॥ जो वैदूर्य काली, जल के समान छाया वाली ( प्रभावहीन ), चिपटी, वजन रहित, स्पर्श में खुरदरी और मध्य में जिसके लाल रेखाएं हों वह अशुभ है ॥ ५८ ॥

अथ गुणाः— वैदूर्यं रक्तपित्तघ्नं प्रज्ञायुर्बलवर्धनम् । पित्तप्रधानरोगघ्नं दीपनं मलमोचनम् ॥ ५६ ॥ वैदूर्यमणि रक्तपित्त और पित्त के प्रधान ( मुख्य ) रोगों (अम्लपित्त) को शान्त करती है। बुद्धि, आयु और बल को बढ़ाती है, मलावरोध को नष्ट करती है तथा पाचकाग्नि को दीप्त करती है ॥ ५९ ॥

अथ रत्नशुद्धिः— शुद्ध्यत्यम्लेन माणिक्यं जयन्त्या मौक्तिकं तथा।

१४८ रसरत्नसमुच्चये—

विद्रुमं क्षारवर्गेण तार्क्ष्यं गोदुग्धकैस्तथा ॥ ६० ॥
पुष्परागं च सन्धानैः कुलत्थक्वाथसंयुतैः ।
तण्डुलीयजलैर्वज्रं नीलं नीलीरसेन च ।
रोचनाभिश्च गोमेदं वैदूर्यं त्रिफलाजलैः ॥ ६१ ॥

माणिक्य अम्ल(१)वर्ग के द्रव्यों के रस से, मोती जयन्तीपत्र स्वरस से, प्रवाल क्षार(२)वर्ग के पदार्थों से, पन्ना गोदुग्ध से, पुष्पराग कुलत्थ क्वाथमिश्रित काञ्जी से, हीरा कांटेदार चौलाई के रस से, नीलम नीलवृक्ष (नीलापराजिता) के रस से, गोमेद गोरोचन से, वैदूर्य त्रिफला के क्वाथ से, एक प्रहर तक दोलायन्त्र द्वारा पकाने से शुद्ध होता है ॥ ६०–६१ ॥

अथ रत्नभस्मक्रमः—

लकुचद्रावसंपिष्टैः शिलागन्धकतालकैः ।
वज्रं विनान्यरत्नानि म्रियन्तेऽष्टपुटैः खलु ॥ ६२ ॥

हीरे को छोड़कर शेष समग्र रत्नों में से प्रत्येक को समान मनःशिला, शुद्ध गंधक और हरताल के साथ मिलाकर बड़हल के रस से घोट कर मूषा में बन्द कर आठ बार फूंकने से भस्म हो जाती है ॥ ६२ ॥

अथ रत्नानां द्रावणम्—

रामठं पञ्चलवणं क्षाराणां त्रितयं तथा ।
मांसद्रवोऽम्लवेतश्च चूलिकालवणं तथा ॥ ६३ ॥
स्थुलं कुम्भीफलं पक्वं तथा ज्वालामुखी शुभा ।
द्रवन्ती च रुदन्ती च पयस्या चित्रमूलकम् ॥ ६४ ॥
दुग्धं स्नुह्यास्तथाऽर्कस्य सर्वं सम्मर्द्य यत्नतः ।


( १ ) आम्लवेतसर्जम्बीरल्लुङ्गाम्लचणकाम्लकाः ।
नागरङ्गं तिन्तिडी च विञ्चापत्रञ्च निम्बुकम् ॥
चाङ्गेरी दाड़िमञ्चैव करमर्दं तथैव च ।
एष चाम्लगणः प्रोक्तो वेतसाम्लसमायुतः ॥ १ ॥

( २ ) सुधापलाशशिखरीचिञ्चार्कतिलनालजाः ।
स्वर्जिका यावशूकश्च क्षाराष्टकमुदाहृतम् ॥ २ ॥

चतुर्थोऽध्यायः। १४९

गोलं विधाय तन्मध्ये प्रक्षिपेत्तदनन्तरम् ॥ ६५ ॥
गुणवन्नवरत्नानि जातिमन्ति शुभानि च ।
भूर्जे तं गोलकं कृत्वा सूत्रेणावेष्ट्य यत्नतः ॥ ६६ ॥
पुनर्वस्त्रेण संवेष्ट्य दोलायन्त्रे निधाय च ।
सर्वाम्लयुक्तसन्धानपरिपूर्णघटोदरे ॥ ६७ ॥
अहोरात्रत्रयं यावत्स्वेदयेत्तीव्रवह्निना ।
तस्मादाहृत्य संक्षाल्य रत्नजां द्रुतिमाहरेत् ।
रत्नतुल्यप्रभा लघ्वी देहलोहकरी शुभा ॥ ६८ ॥

हींग, पाँचो (१) लवण (सैन्धव, सामुद्र, विड़, सौवर्चल, रोमक) तीनों (२) क्षार, (सज्जीखार, यवक्षार, सुहागा) मांसद्रव = मांसरस या अम्लवेत का भेद और अम्लवेत, नौसादर, कायफल या पक्वजैपालबीज, उत्तम कलिहारी, गोरोचन, मूषाकानी या चीरितपत्र की दन्ती, रुदन्ती, दुग्धी, चित्रकजड़, सेंहुड़ और मदार का दुग्ध इन सबको घोट कर गोला बना लेवें, फिर उस गोले में जिस रत्न की द्रुति करना हो उसको (जो कि शुभ जाति का हो, नवीन हो) रख कर बन्द कर दें, फिर गोले को भोज पत्र में रखकर धागे से अच्छी तरह बांधकर और फिर ऊपर से वस्त्र लपेटकर दोला-यन्त्र की विधि से सर्व प्रकार के अम्लवर्ग के पदार्थों के साथ तीन रात दिन तक तीव्र अग्नि से स्वेदन करें। चौथे दिन पोटली को यन्त्र से बाहर निकाल कर धो डालें और उसमें से रत्न की द्रुति को ग्रहण करें। यह रत्नद्रुति रत्नों के समान तेज वाली, लघु और शरीर की सिद्धि करने वाली तथा शुभ है ॥ ६३-६८ ॥

अथ मुक्ताद्रावणे विशेषक्रमः—

मुक्ताचूर्णं तु सप्ताहं वेतसाम्लेन मर्दितम् ।
जम्बीरोदरमध्ये तु धान्यराशौ विनिक्षिपेत् ।


( १ ) सैन्धवञ्चाथ सामुद्रं विडं सौवर्चलं तथा ।
रोमकञ्चेति विज्ञेयं बुधैर्लवणपञ्चकम् ॥
( २ ) स्वर्जिक्षारो यवक्षारः क्षारद्वयमुदाहृतम् ।
सौभाग्येन समायुक्तं क्षारत्रिकमुदाहृतम् ॥

२५० | रसरत्नसमुच्चये—

सप्ताहादुद्धृतं चैव पुटं दत्वा द्रुति हरेत् ॥ ६९ ॥

मोती चूर्ण को सात दिन तक अम्लवेत के रस से घोटकर गोला बनाकर बड़े निम्बू के बीच में चीर कर रख दें, फिर उस निम्बू को डोरे से बांधकर धान के ढेर में गाड़ दें, सात दिन के बाद जम्बीर को निकाल कर मूषायन्त्र में बन्द करके गजपुट दे देवें । फिर द्रुति ग्रहण करें ॥ ६९ ॥

वज्रद्रावणविशेषविधिः— वज्रवल्ल्यन्तरस्थं च कृत्वा वज्रं निरोधयेत् । अम्लभाण्डगतं स्वेद्यं सप्ताहाद्द्रवतां व्रजेत् ॥ ७० ॥

शुद्ध हीरे को अस्थिसंहारी (हड़जोड़) के जड़के बीच में गढ़ा (खात) कर रख दें और डोरे से अच्छी प्रकार बन्द कर दें, और दोला यन्त्र में अम्लवर्ग के पदार्थों का रस भरकर सात दिन तक स्वेदन करें तो हीरे का द्रव हो जाता है ॥ ७० ॥

अथ वैक्रान्तद्रावणे विशेषक्रमः— श्वेतवर्णं तु वैक्रान्तमम्लवेतसभावितम् । सप्ताहान्नात्र सन्देहः खरघर्मे द्रुवत्यलम् ॥ ७१ ॥

श्वेत वैक्रान्त के चूर्ण को अम्लवेत के रस की भावना देकर घोट कर तीव्र धूप में सुखावें । इस तरह सात दिन भावना देकर सुखाने से वैक्रान्त की द्रुति हो जाती है ॥ ७१ ॥

अन्यविधिः— केतकीस्वरसं ग्राह्यं सैन्धवं स्वर्णपुष्पिका । इन्द्रगोपकसंयुक्तं सर्वं भाण्डे विनिक्षिपेत् । सप्ताहं स्वेदयेत्तस्मिन्वैक्रान्तं द्रवतां व्रजेत् ॥ ७२ ॥

अथवा केवड़े का स्वरस, सेंधानमक, स्वर्ण क्षीरी या कटेरी और इन्द्रगोप (वीर बहूटी) इन को पीस कर भाण्ड में भर दें फिर उसमें वैक्रान्त डालकर सात दिन तक स्वेदन करने से वैक्रान्त की द्रुति हो जाती है ॥ ७२ ॥

अन्यविधिः— लोहाष्टके तथा वज्रे वापनात्स्वेदनाद्द्रुतिः । जायते नात्र सन्देहो योगस्यास्य प्रभावतः ॥ ७३ ॥ कुरुते योगराजोऽयं रत्नानां द्रावणं परम् ॥ ७४ ॥

चतुर्थोऽध्यायः । १५१

चतुर्थोऽध्यायः । १५१

इस उपर्युक्त द्रुति को लोहाष्टक (स्वर्ण, रोप्य, ताम्र, वङ्ग, सीस, पित्तल, कान्तलौह, तीक्ष्ण लोह) में या हीरे की भस्म में डालकर स्वेदन करने से उन लोहों का तथा हीरे का द्रवण हो जाता है। यह इस वैक्रान्त द्रुति का प्रभाव है और यह द्रुति अन्य रत्नों का भी द्रवण कर देती है ॥ ७३-७४ ॥

अथ राजावर्तः—उत्तममध्यमराजावर्तलक्षणम्—
राजावर्तोऽल्परक्तोरुनीलिकामिश्रितप्रभः ।
गुरुश्च मसृणः श्रेष्ठस्तदन्यो मध्यमः स्मृतः ॥ ७५ ॥
राजावर्त कुछ लाल और अधिक नीले रंग का होता है जो राजावर्त वजन में भारी और कोमल या स्निग्ध हो वह श्रेष्ठ है विपरीत मध्यम होता है ॥ ७५ ॥

अथ गुणाः—
प्रमेहक्षयदुर्नामपाण्डुश्लेष्मानिलापहः ।
दीपनः पाचनो वृष्यो राजावर्तो रसायनः ॥ ७६ ॥
यह बीस प्रकार के प्रमेह, क्षय, अर्श, पाण्डु और वात तथा कफ के विकारों को नष्ट करता है तथा दीपन, पाचन, वृष्य और रसायन होता है ॥ ७६ ॥

राजावर्तादिसामान्यशोधनम्—
निम्बुद्रवैः सगोमूत्रैः सक्षारैः स्वेदिता खलु ।
द्वित्रिवारेण शुद्ध्यन्ति राजावर्तादिधातवः ॥ ७७ ॥
निम्बूके रस में यवक्षार और गोमूत्र मिलाकर दोलायन्त्र द्वारा राजावर्त तथा अन्यधातुओं को दो या तीन वार एक २ प्रहर तक स्वेदन करने से वे शुद्ध हो जाते हैं ॥ ७७ ॥

अथ राजावर्तशोधनम्—
शिरीषपुष्पार्द्ररसैः राजावर्तं विशोधयेत् ॥ ७८ ॥
राजावर्त शिरीषपुष्प और अद्रक के स्वरस में स्वेदन करने से शुद्ध हो जाता है ॥ ७८ ॥

अथ राजावर्तमारणम्—
लुङ्गाम्बुगन्धकोपेतो राजावर्तो विचूर्णितः ।
पुटनात्सप्तवारेण राजावर्तो मृतो भवेत् ॥ ७९ ॥
राजावर्तभस्म—राजावर्त को समान भाग गन्धक के साथ निम्बू के रस से घोटकर शराव में सम्पुटकर सात वार पुट देने से मृत हो जाता है ॥ ७९ ॥

१५२ || रसरत्नसमुच्चये—

अथ सत्त्वपातनम्—

राजावर्तस्य चूर्णन्तु कुनटी घृतमिश्रितम् ।
विपचेदायसे पात्रे महिषीक्षीरसंयुक्तम् ॥ ८० ॥
सौभाग्यपञ्चगव्येन पिण्डीबद्धन्तु जारयेत् ।
धमापितं खदिराङ्गारैः सत्त्वं मुञ्चति शोभनम् ॥ ८१ ॥
इति राजावर्ताधिकारः ।

शुद्ध राजावर्त का चूर्ण कर समान मनःशिला मिला कर घृत के साथ घोट ले, पश्चात् लौहे के पात्र ( कड़ाही ) में भैंस का दुग्ध डालकर राजावर्त को पकाना चाहिए । दुग्ध के अत्यन्त गाढ़ा होने के बाद उसमें सुहागा और पञ्चगव्य मिला-कर द्रवांश का जारण कर गोला बना लेवे पश्चात् खदिर ( खैर ) के कोयलों की अग्नि में फूंकने से सत्त्व निकल आता है ॥ ८०–८१ ॥

अथ द्रुतीनां दीर्घकालरक्षणोपायः—

कुसुम्भतैलमध्ये तु संस्थाप्या द्रुतयः पृथक् ।
तिष्ठन्ति चिरकालं तु प्राप्ते कार्ये नियोजयेत् ॥ ८२ ॥

**अथ द्रुतीनां दीर्घकालरक्षणोपायः—**सब द्रुतियों को पृथक् २ काच के पात्र में कुसुम्भ का तैल डाल कर रखने से वे बहुत समय तक गुणहीन नहीं होती हैं । समय पर औषधिकार्य में उनका प्रयोग करना चाहिये ॥ ८२ ॥

रत्नधारणगुणाः—

सूर्यादिग्रहनिग्रहापहरणं दार्घायुरारोग्यदं
सौभाग्योदयभाग्यवश्यविभवोत्साहप्रदं धैर्यकृत् ।
दुश्छायाचलधूलिसंगतिभवाऽलक्ष्मीहरं सर्वदा
रत्नानां परिधारणं निगदितं भूतादिभिर्नाशनम् ॥ ८३ ॥

उपर्युक्त नवरत्नों की ग्रहों के नामानुसार अङ्गूठी बनाकर धारण करने से उन ग्रहों से उत्पन्न बाधाएं दूर होती हैं और दीर्घायु तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है तथा सौभाग्य ( स्त्रीप्रियत्व ) और भाग्य का उदय होता है, वशीकरण सिद्धि की प्राप्ति होती है, ऐश्वर्य और उत्साह बढ़ता है, धैर्य प्राप्त होता है, तथा भूतप्रेतों की अशुभछाया, वायु से बहने वाली धूलि समूह से उत्पन्न अशोभा, और भूत प्रेतों की बाधा आदि उपद्रव दूर होते हैं ॥ ८३ ॥

पञ्चमोऽध्यायः । १५३

अथ गैरिकम्–गैरिकस्य शोधनं सत्त्वपातनञ्च— अनेन क्रमयोगेन गैरिकं विमलं भवेत् । क्रमात् पीतञ्च रक्तञ्च सत्त्वं पतति शोधनम् ॥ ८४ ॥

इति श्री वैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये रत्नानां शुद्ध्यादिनिरूपणं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥


इसी तरह गैरिक की शुद्धि और सत्त्वपातन भी होता है। पाषाणगैरिक का सत्त्व पीतवर्ण और स्वर्ण गैरिक का सत्त्व लाल वर्ण का होता है ॥ ८४ ॥

इति श्रीकृष्णात्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्य-भाषाटीकायामुपरस- साधारणरसनिरूपणं नाम चतुर्थोऽध्यायः ।


अथ पञ्चमोऽध्यायः ।

अथ लोहानि–लोहजातिपरिगणनम्— शुद्धं लोहं कनकरजतं भानुलोहाश्मसारम् । पूतीलोहं द्वितयमुदितं नागवङ्गाभिधानम् । मिश्रं लोहं त्रितयमुदितं पित्तलं कांस्यवर्तम् । धातुर्लोहे लुह इति मतः सोऽप्यनेकार्थवाची ॥ १ ॥

जिन खनिज धातुओं के लिये लोह शब्द का प्रयोग होता है वे लोह धातु तीन प्रकार की होती हैं, जैसे १ शुद्ध लोह, २ पूति लोह, ३ मिश्रलोह, सोना, चांदी, ताम्बा और लोहा ( मुण्ड, तीक्ष्ण, कान्त ) ये चार शुद्ध लोह हैं और नाग ( सीस ), वङ्ग ( राङ्गा ) ये दोनों पूती लोह हैं और पित्तल, कांसो, भरत या

१५४ रसरत्नसमुच्चये—

रूक्मलोह ये तीनों तृतीय जाति के मिश्र लोह हैं। लुह धातु को लोह अर्थ (कन-करजत के लिये) में या आकर्षण अर्थ में प्रयोग करते हैं क्योंकि सप्त या अष्ट लोह (कनकादिक) भी दोषों को खींच कर निकाल देते हैं और लोह शब्द भी अगुरूलोहित सुवर्णादि अनेक अर्थों का वाचक है ॥ १ ॥

अथ स्वर्णम्—स्वर्णभेदाः—

प्राकृतं सहजं वह्निसम्भूतं खनिसम्भवम् ।
रसेंद्रवेधसञ्जातं स्वर्णं पञ्चविधं स्मृतम् ॥ २ ॥

सुवर्ण १ प्राकृत, २ सहज, ३ वह्नि से उत्पन्न, ४ खनिज से उत्पन्न, रसेन्द्र के वेध (खेदनादिक) से उत्पन्न, इस प्रकार यह पाँच तरह का होता है ॥ २ ॥

अथ प्राकृतस्वर्णस्योत्पत्तिः—

ब्रह्माण्डं संवृतं येन रजोगुणभुवा खलु ।
तत्प्राकृतमिति प्रोक्तं देवानामपि दुर्लभम् ॥ ३ ॥

रजोगुण से उत्पन्न हुए जिस सुवर्ण से ब्रह्माजी का आधारभूत स्वर्णमय अण्ड(१)या ब्रह्माण्ड (संसार) पैदा हुआ वह प्राकृत सुवर्ण है और वह देवताओं के लिये भी दुर्लभ है ॥ ३ ॥

अथ सहजस्वर्णोत्पत्तिः—

ब्रह्मा येनाऽवृता जातः सुवर्णेन जरायुणा ।
तन्मेरुरूपतां यातं सुवर्णं सहजं हि तत् ॥ ४ ॥

जिस सुवर्ण की जरायु से वेष्टित ब्रह्माजी उत्पन्न हुये वह सुवर्ण मेरुपर्वत के रूप में परिणत हुआ, उसी को स्वाभाविक (सहज) सुवर्ण कहते हैं ॥ ४ ॥

वह्निजस्वर्णोत्पत्तिः—

विसृष्टमग्निना शवं तेजः पीतं सुदुःसहम् ।
अभूत्सर्व्वसमुद्दिष्टं सुवर्णं वाह्निसम्भवम् ॥ ५ ॥


( १ ) सोऽभिध्याय शरीरात् खात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ।
अत एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥
तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् ।
तस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥

पञ्चमोऽध्यायः । १५५

पञ्चमोऽध्यायः । १५५

महादेवजी के वीर्य को अग्निदेवता ने पान कर असह्य होने के कारण बाहर निकाल दिया वही वह्नि से उत्पन्न सुवर्ण कहलाया ॥ ५ ॥

स्वर्णत्रयगुणाः— एतत्स्वर्णत्रयं दिव्यं वर्णैः षोडशभिर्युतम् । धारणादेव तत्कुर्याच्छरीरमजरामरम् ॥ ६ ॥
ये तीनों प्रकार के सुवर्ण दिव्य शक्तियों से युक्त और सोलह कलाओं से सम्पन्न हैं, इनके केवल धारण करने से शरीर अजर अमर हो जाता है ॥ ६ ॥

खनिजस्वर्णोत्पत्तितल्लक्षणगुणाश्च— तत्र तत्र गिरीणां हि जातं खनिषु यद्भवेत् । तच्चतुर्दशवर्णाढ्यं भक्षितं सर्वरोगहृत् ॥ ७ ॥
विन्ध्य सुमेरु हिमालयादि पर्वतों की खानों में उत्पन्न हुआ सुवर्ण खनिज सुवर्ण कहलाता है । वह चौदह कलाओं से युक्त होता है तथा सेवन करने से सब रोगों को नष्ट करता है ॥ ७ ॥

वेधजस्वर्णोत्पत्तिर्गुणाश्च— रसेन्द्रवेधसम्भूतं तद्वेधजमुदाहृतम् । रसायनं महाश्रेष्ठं पवित्रं वेधजं हि तत् ॥ ८ ॥
पारद के वेधन कर्म से उत्पन्न सुवर्ण रसेन्द्रवेधसञ्जात सुवर्ण कहलाता है । यह रसायन है, औषध कर्म में उत्तम तथा पवित्र है ॥ ८ ॥

स्वर्णरौप्ययोःसामान्यगुणाः— आयुर्लक्ष्मीप्रभाधीस्मृतिकरमखिलव्याधिविध्वंसि पुण्यं
भूतावेशप्रशान्तिस्मरभरसुखदं सौख्यपुष्टिप्रकाशि ।
गाङ्गेयं चाथ रूप्यं गदहरमजराकारि मेहापहारी
क्षीणानां पुष्टिकारि स्फुटमतिकरणं वीर्यवृद्धिप्रकारि ॥ ९ ॥
यह स्वर्ण आयु, शोभा, कान्ति, बुद्धि और स्मृति को उत्पन्न करता है, सम्पूर्ण व्याधियों को नष्ट करता है, पवित्र है, भूत प्रेतों के आवेश को दूर करता है, भोग शक्ति को बढाता है, सौख्य और पुष्टि करता है । गाङ्गेय सुवर्ण की तरह चांदी भी रोगों को हरती है, शरीर को अजर ( बुढापारहित ) करती है और

१५६ | रसरत्नसमुच्चये—

प्रमेह को नष्ट करती है, क्षीण पुरुषों को पुष्ट करती है, बुद्धि को स्फुट करती है और वीर्य को बढाती है ॥ ९ ॥

स्वर्णगुणाः—

स्निग्धं मेध्यं विषगदहरं बृंहणं वृष्यमग्र्यं
यक्ष्मोन्मादप्रशमनपरं देहरोगप्रमाथि ।
मेधावृद्धिस्मृतिसुखकरं सर्वदोषामयघ्नं
रुच्यं दीप्तिप्रशमितरुजं स्वादुपाकं सुवर्णम् ॥ १० ॥

सुवर्ण स्निग्ध, वृष्य, बृंहण, मेध्य है और विषबाधा को नष्ट करता है, वह्नि का दीपक, यक्ष्मा का नाशक और शरीर के रोगों का नाशक, मेधा, (स्मरण शक्ति) बुद्धि, स्मृति, सुख का उत्पादक सम्पूर्ण दोष और रोगों का नाशक, रुचिकारक है और वह्नि को दीप्तकर रोगों की शान्ति करता है तथा स्वादुपाक होता है ॥ १० ॥

अशोधितामारितस्वर्णदोषाः—

सौख्यं वीर्यं बलं हन्ति रोगवर्गं करोति च ।
अशुद्धममृतं स्वर्णं तस्माच्छुद्धं च मारयेत् ॥ ११ ॥

अशुद्ध और विना भस्म किया हुआ सुवर्ण सेवन करने से सौख्य, वीर्य और बल का नाश होता है तथा रोग समूह को उत्पन्न करता है इसलिये प्रथम शोधन कर भस्म करना चाहिए ॥ ११ ॥

स्वर्णशोधनम्—

कर्षप्रमाणं तु सुवर्णपत्रं शरावरुद्धं पटुधातुयुक्तम् ।
अङ्गारसंस्थं प्रहरार्धमानं ध्मातेन तत्स्यान्ननु पूर्णवर्णम्॥ १२॥

एक कर्ष (एक तोला) सुवर्ण के पत्र (वर्क) में गन्धक या सेंधा नमक और गेरू समान भाग मिलाकर शराव में बन्दकर आधे प्रहर तक धोंकनी से तेज अग्नि में फूंकने से सुवर्ण शुद्ध होकर श्रेष्ठ वर्ण का हो जाता है ॥ १२ ॥

लोहमारणार्थमुत्तमद्रव्यकथनम्—

लोहानां मारणं श्रेष्ठं सर्वेषां रसभस्मना ।
मूलीभिर्मध्यमं प्राहुः कनिष्ठं गन्धकादिभिः ।
अरिलोहेन लोहस्य मारणं दुर्गुणप्रदम् ॥ १३ ॥

स्वर्णादि आठ प्रकार के लोहों का पारद भस्म के साथ मारण करना श्रेष्ठ है

पञ्चमोऽध्यायः । १५७

पञ्चमोऽध्यायः । १५७

और ओषधियों के साथ धातुओं का मारण मध्यम होता है तथा गन्धक मनःशिला आदि के साथ धातुओं ( लोह ) का मारण कनिष्ठ होता है और हरताल के साथ से मारण करने से लोहों में अवगुण उत्पन्न होते हैं ॥ १३ ॥

अथ स्वर्णमारणम्— कृत्वा कण्टकवेध्यानि स्वर्णपत्राणि लेपयेत् । लुङ्गाम्बुभस्मसूतेन म्रियते दशभिः पुटैः ॥ १४ ॥ शुद्ध किये सोने के सूई से छेदन करने लायक पत्र बनाकर निम्बू के रस में घोटे हुए पारद का मर्दनविधि से उन पर लेप कर देना चाहिये । इस तरह दस पुट देने से भस्म हो जाती है ॥ १४ ॥

अन्यविधिः— द्रुते विनिक्षिपेत्स्वर्णे लोहमानं मृतं रसम् । विचूर्ण्य लुङ्गतोयेन दरदेन समन्वितम् ॥ जायते कुङ्कुमच्छायं स्वर्णं द्वादशभिः पुटैः ॥ १५ ॥ अथवा स्वर्ण को पिघला कर समान पारे की भस्म मिलाकर बिजौरे निम्बू के रस से घोटकर स्वर्ण के समान हिङ्गुल मिलाकर घोटकर १२ पुट देने से स्वर्ण की केशर के समान लाल भस्म हो जाती है ॥ १५ ॥

अन्यविधिः— हेम्नः पादं मृतं सूतं पिष्टमम्लेन केनचित् । पत्रे लिप्त्वा पुटैः पच्यादष्टभिर्म्रियते ध्रुवम् ॥ १६ ॥ अथवा सुवर्ण से चतुर्थांश पारद भस्म को किसी अम्ल में घोट कर सुवर्ण के पत्रों पर लेप कर दें, फिर पुट देवें । इस तरह आठ पुट देने से निश्चय ही सुवर्ण-भस्म हो जाती है । प्रत्येक पुट में चतुर्थांश पारद भस्म डालनी चाहिये ॥ १६ ॥

स्वर्णद्रावणम्— मण्डूकास्थिवसाटङ्कहयलालेन्द्रगोपकैः । प्रतिवापेन कनकं सुचिरं तिष्ठति द्रुतम् ॥ १७ ॥ **सुवर्णद्रुतिः—**सुवर्ण को गलाकर मेंढक की हड्डी का चूर्ण और चर्बी, सुहागा, घोड़ेकी लाला ( लार ), वीर बहूटी इनके साथ घोट कर फिर अग्नि पर फूंकने से सुवर्ण की बहुत समय तक ठहरने लायक द्रुति हो जाती है ॥ १७ ॥

१५८ रसरत्नसमुच्चये—

अन्यविधिः— चूर्णं सुरेन्द्रगोपानां देवदालीफलद्रवैः । भावितं सदृशं हेम करोति जलवद्द्रुतम् ॥ १८ ॥ अथवा इन्द्रगोप के चूर्ण को देवदाली ( बन्दाल ) के रस से भावित कर इसको सोने में मिलाकर फूंकने से वह जल के समान द्रुत हो जाता है ॥ १८ ॥

स्वर्णभस्मप्रयोगविधिः— एतद्भस्म सुवर्णजं कटुघृतोपेतं द्विगुञ्जोन्मितं लीढं हन्ति नृणां क्षयाग्निसदनं श्वासं च कासारुचिम् । ओजोधातुविवर्धनं बलकरं पाण्ड्वामयध्वंसनं पथ्यं सर्वविषापहं गरहरं दुष्टग्रहण्यादिनुत् ॥ १९ ॥ सुवर्णभस्मसेवनविधि—दो रत्ती सुवर्ण भस्म को त्रिकटु और घृत के साथ सेवन करने से मनुष्यों के श्वास, कास, अरुचि, क्षय, अग्निमांद्य, पाण्डु, सर्पविषबाधा, सर्वविषबाधा, दुष्ट ग्रहणी आदि अनेक रोग नष्ट हो जाते हैं तथा ओज(१) बल और सप्त (२)धातुओं की वृद्धि होती है और यह अत्यन्त हितकर है ॥ १९ ॥

अशुद्धामारित स्वर्णदोषाः— बलं च वीर्यं हरते नराणां रोगव्रजं कोपयतीव काये । असौख्यकारं च सदैव हेमापक्वं सदोषं मरणं करोति ॥२०॥

इति स्वर्णाधिकारः—

अशुद्धस्वर्णदोषः— अशुद्ध और उत्तमविधि से अपक्व सुवर्ण के सेवनकरने से मनुष्यों के बल-


( १ ) हृदि तिष्ठति यच्छुद्धमीषद्रक्तं सपीतकम् ।
ओजः शरीरे सङ्ख्यातं तन्नाशान्न विनश्यति ॥
अष्टबिन्दुप्रमाणं तदीषद्रक्तं सपीतकम् ।
अग्निषोमात्मकत्वेन द्विरूपं वर्णितञ्च तत् ॥
ओजश्च तेजोधातूनां शुक्रान्तानां परं स्मृतम् ।
हृदयस्थमपि व्यापि देहस्थितिनिबन्धनम् ॥

( २ ) रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः ।

पञ्चमोऽध्यायः। १५९

और वीर्य्य का हरण होता है, शरीर में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं तथा बैचेनी और मरण करता है ॥ २० ॥

अथ रजतम्—रजतभेदाः— सहजं खनिजञ्जातं कृत्रिमं त्रिविधं मतम् । रजतं पूर्वपूर्वं हि स्वगुणैरुत्तरोत्तरम् ॥ २१ ॥ चान्दी सहज, खनिज और कृत्रिम भेद करके तीन तरह की होती है । तीनों में पूर्व पूर्व की चांदी अपने २ गुणों में उत्कृष्ट होती है ॥ २१ ॥

सहजरौप्योत्पत्तिर्गुणाश्च— कैलासाद्यद्रिसम्भूतं सहजं रजतं भवेत् । तत्स्पृष्टं हि सकृद्व्याधिनाशनं देहिनां भवेत् ॥ २२ ॥ कैलासादि पर्वत में उत्पन्न होने वाली चान्दी सहज होती है । इसके स्पर्श मात्र से मनुष्यों की व्याधियां तुरन्त नष्ट हो जाती हैं ॥ २२ ॥

खनिजरौप्योत्पत्ति गुणाश्च— हिमालयाद्रिकूटेषु यद्रूप्यं जायते हि तत् । खनिजं कथ्यते तज्ज्ञैः परमं हि रसायनम् ॥ २३ ॥ हिमालय आदि पर्वतों के शिखरों की खानों से उत्पन्न चान्दी को विद्वान् लोग खनिज चान्दी कहते हैं और वह उत्तम रसायन है ॥ २३ ॥

कृत्रिमरौप्योत्पत्तिर्गुणाश्च— श्रीरामपाडुकान्यस्तं वङ्गं यद्रूप्यतां गतम् । तत्पादरूप्यमित्युक्तं कृत्रिमं सर्वरोगनुत् ॥ २४ ॥ श्रीरामचन्द्रजी के चरणों के स्पर्श से जो वङ्ग चान्दी के रूप में परिणत हुआ उसको रामचन्द्रजी के चरण की कृत्रिम चान्दी कहते हैं। यह सर्वरोगों को नष्ट करती है॥२४॥

उत्तमरौप्यलक्षणम्— घनं स्वच्छं गुरु स्निग्धं दोहे छेदे सितं मृदु । शङ्खाभं मसृणं स्फोटरहितं रजतं शुभम् ॥ २५ ॥ श्रेष्ठ रजत के लक्षण—जो चान्दी वजनदार, खच्छ, भारी, स्निग्ध जलाने और काटने पर श्वेत, कोमल, मसृण, शङ्ख के समान और खातों से रहित हो वह औषधि में श्रेष्ठ है ॥ २५ ॥