भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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१५२ || रसरत्नसमुच्चये—

अथ सत्त्वपातनम्—

राजावर्तस्य चूर्णन्तु कुनटी घृतमिश्रितम् ।
विपचेदायसे पात्रे महिषीक्षीरसंयुक्तम् ॥ ८० ॥
सौभाग्यपञ्चगव्येन पिण्डीबद्धन्तु जारयेत् ।
धमापितं खदिराङ्गारैः सत्त्वं मुञ्चति शोभनम् ॥ ८१ ॥
इति राजावर्ताधिकारः ।

शुद्ध राजावर्त का चूर्ण कर समान मनःशिला मिला कर घृत के साथ घोट ले, पश्चात् लौहे के पात्र ( कड़ाही ) में भैंस का दुग्ध डालकर राजावर्त को पकाना चाहिए । दुग्ध के अत्यन्त गाढ़ा होने के बाद उसमें सुहागा और पञ्चगव्य मिला-कर द्रवांश का जारण कर गोला बना लेवे पश्चात् खदिर ( खैर ) के कोयलों की अग्नि में फूंकने से सत्त्व निकल आता है ॥ ८०–८१ ॥

अथ द्रुतीनां दीर्घकालरक्षणोपायः—

कुसुम्भतैलमध्ये तु संस्थाप्या द्रुतयः पृथक् ।
तिष्ठन्ति चिरकालं तु प्राप्ते कार्ये नियोजयेत् ॥ ८२ ॥

**अथ द्रुतीनां दीर्घकालरक्षणोपायः—**सब द्रुतियों को पृथक् २ काच के पात्र में कुसुम्भ का तैल डाल कर रखने से वे बहुत समय तक गुणहीन नहीं होती हैं । समय पर औषधिकार्य में उनका प्रयोग करना चाहिये ॥ ८२ ॥

रत्नधारणगुणाः—

सूर्यादिग्रहनिग्रहापहरणं दार्घायुरारोग्यदं
सौभाग्योदयभाग्यवश्यविभवोत्साहप्रदं धैर्यकृत् ।
दुश्छायाचलधूलिसंगतिभवाऽलक्ष्मीहरं सर्वदा
रत्नानां परिधारणं निगदितं भूतादिभिर्नाशनम् ॥ ८३ ॥

उपर्युक्त नवरत्नों की ग्रहों के नामानुसार अङ्गूठी बनाकर धारण करने से उन ग्रहों से उत्पन्न बाधाएं दूर होती हैं और दीर्घायु तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है तथा सौभाग्य ( स्त्रीप्रियत्व ) और भाग्य का उदय होता है, वशीकरण सिद्धि की प्राप्ति होती है, ऐश्वर्य और उत्साह बढ़ता है, धैर्य प्राप्त होता है, तथा भूतप्रेतों की अशुभछाया, वायु से बहने वाली धूलि समूह से उत्पन्न अशोभा, और भूत प्रेतों की बाधा आदि उपद्रव दूर होते हैं ॥ ८३ ॥