रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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रसरत्नसमुच्चये-
गुल्मप्लीहयकृन्मूर्च्छाशूलपक्त्यर्थमुत्तमम् ॥ ६५ ॥
दोषत्रयसमुद्भूतानामयाञ्जयति ध्रुवम् ।
रोगानुपानसहितं जयेद्धातुगतं ज्वरम् ।
रसे रसायने ताम्रं योजयेद्युक्तमात्रया ॥ ६६ ॥
ताम्र के बराबर पारद और उतना ही गन्धक तथा ताम्र की आधी हरताल और हरताल की आधी मनःशिला इन चारों की उत्तम कजली वना कर एक शराव में नीचे आधी कजली रखकर ताम्र पत्र रख दे तथा ऊपर से फिर कज्जली रख-कर गर्भयन्त्र के अन्दर एक प्रहर तक पकावैं । स्वाङ्गशीत होने पर पक्व ताम्र निकाल कर चूर्ण करलें । इस विधि से बनी हुई ताम्रभस्म को सोमनाथोक्तताम्रभस्म कहते हैं । इसके सेवन के गुण-इस भस्म को भिन्न २ रोगहरण करने वाले अनु-पानों के साथ दो रत्ती की मात्रा के रूप में सेवन करने से परिणामशूल, उदररोग (जलोदर) पाण्डु, ज्वर, गुल्म, प्लीह, यकृत, वृद्धि, क्षय, मन्दाग्नि, प्रमेह, अर्श और दुष्टसंग्रहणी रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ ६२-६६ ॥
अथ लौहम्-
लौहभेदाः-
मुण्डं तीक्ष्णं च कान्तं च त्रिप्रकारमयः स्मृतम् ॥ ६७ ॥
मुण्ड, तीक्ष्ण, कान्त, इन भेदों से लौह तीन प्रकार का होता है ॥ ६७ ॥
मुण्डलौहभेदाः-
मृदु कुण्ठं कडारं च त्रिविधं मुण्डमुच्यते ॥ ६८ ॥
मुण्डलौह भी तीन प्रकार का है यथा-मृदु, कुण्ठ, कडार ॥ ६८ ॥
मृदुमुण्डलक्षणम्-
द्रुतद्रावमविस्फोटं चिकणं मृदु तच्छुभम् ॥ ६९ ॥
जो लौह अग्नि में तपाने से शीघ्र गल जाय और हथौड़े या घन से पीटने पर चूर्ण होकर विखरे नहीं तथा मृदु और कोमल हो उसको मृदुलौह कहते हैं॥६९॥
कुण्ठमुण्डलक्षणम्-
हतं यत्प्रसरेद् दुःखात्तत्कुण्ठं मध्यमं स्मृतम् ॥ ७० ॥
जो लौह घन से पीटने पर बहुत देर में कठिनता से बढ़े या चूर्ण हो जाय उसको कुण्ठ लौह कहते हैं । यह मध्यम होता है ॥ ७० ॥