भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 362 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 259

पञ्चमोऽध्यायः। १६९

कडारमुण्डलक्षणम्—

यद्धतं भज्यते भङ्गे कृष्णं स्यात्तत्कडारकम् ॥ ७१ ॥
जो लौह घन से पीटने पर जल्दी चूर्ण हो जाय और तोड़ने पर भीतर से काले रंग का हो वह कडारक लौह कहलाता है ॥ ७१ ॥

मुण्डगुणाः—

मुण्डं परं मृदुलकं कफवातशूलमूलाममेहगदकामलपाण्डुहारि ।
गुल्मामवातजठरार्तिहरं प्रदीपं शोफापहं रुधिरकृत्खलु कोष्ठशोधि ॥ ७२ ॥
मुण्ड लौह के तीन भेदों में जो अत्यन्त मृदु लौह होता है वह कफ, वात, शूल, अर्श या शिरो रोग, आम, प्रमेह, कामला, पाण्डु, गुल्म, आमवात, उदर-रोग, शोथ इन रोगों को नष्ट करता है, जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, रुधिर को बढ़ाता है और कोष्ठ की शुद्धि करता है ॥ ७२ ॥

अथाशुद्धलौहस्य दोषाः—

अशुद्धलोहं न हितं निषेवणादायुर्बलं कान्तिविनाशि निश्चितम् ॥
हृदि प्रपीडां तनुते ह्यपाटवं रुजं करोत्येव विशोध्य मारयेत् ॥ ७३ ॥
अशुद्ध लौह सेवन करना अहितकर है। इसके सेवन से आयु, बल और कान्ति नष्ट होती है। यह हृदय में अत्यन्त वेदना और रोग तथा शरीर में शिथिलता उत्पन्न करता है इसलिये इसको शुद्ध कर के पश्चात् इसकी भस्म करनी चाहिये ॥ ७३ ॥

अथ तीक्ष्णलौहम्—

तीक्ष्णलौहभेदाः—

खरं सारं च हृन्नालं तारावट्टं च वाजिरम् ।
काललोहाभिधानं च षड्विधं तीक्ष्णमुच्यते ॥ ७४ ॥
खर, सार, हृन्नाल, तारावट्ट, वाजिर और काललौह ये तीक्ष्ण लौह के छ भेद हैं ॥ ७४ ॥

खरलोहलक्षणम्—

परुषं पोगरोन्मुक्तं भङ्गे पारदवच्छवि ।
नमने भङ्गुरं यत्तत्खरलोहमुदाहृतम् ॥ ७५ ॥
जो लौह कठोर, तरङ्गसदृश रेखाओं से रहित तथा तोड़ने पर पारद के समान चमकदार तथा मोड़ने से भङ्गुर हो वह खर लौह कहलाता है ॥ ७५ ॥