रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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लौहभस्म के गुण—यह निरुत्थ लौह भस्म अमृत के समान गुणकारी और सिद्ध रसायन है। इस भस्म को चार मासे की मात्रा में त्रिकटु, वायविडङ्ग, शहद और घृत के साथ सेवन करने से जरा, मरण तथा सर्व व्याधियां नष्ट हो जाती हैं और सत्पुत्र को देती है। किसी समय महादेवजी ने कालयवन के पिता को पुत्र की प्राप्ति के लिये इस भस्म के सेवन का उपदेश दिया था॥ १३८॥
अथ लौहानां रामराजीप्रोक्तगुणाः—
लौहं जन्तुविकारपाण्डुपवनक्षीणत्वपित्तामय-
स्थौल्यार्शोग्रहणीज्वरार्तिकफजिच्छ्लोफप्रमेहप्रणुत्।
गुल्मप्लीहविषापहं बलकरं कुष्ठाग्निमान्द्यप्रणुत्
सौख्यालं विरसायनं मृतिहरं किट्टं च कान्तादिवत् ॥१३६॥
मृतानि लोहानि रसीभवन्ति निघ्नन्ति युक्तानि महामयांश्च।
अभ्यासयोगाद् दृढदेहसिद्धिं कुर्वन्ति रुज्जन्मजराविनाशम् ॥ १४० ॥
लौहभस्म कृमि से उत्पन्न विकार, पाण्डु, वायुरोग, क्षीणता, पित्तजन्यरोग, स्थूलता, बवासीर, संग्रहणी, ज्वर, कफ, शोथ, प्रमेह, गुल्म, प्लीहा, विषबाधा, कुष्ठ और मन्दाग्नि को नष्ट करती है, बल को बढ़ाती है, सुखकारक, उत्तम रसायन है और मृत्यु को नष्ट करती है। लौह का किट्ट भी कान्त लौह के समान गुणकारक होता है।
सर्वप्रकार के मृत लौह रस के समान गुणकारी और बड़े-२ भयङ्कर रोगों को नष्ट करते हैं। इनके सेवन करने से देह दृढ और स्थिर हो जाती है और ये लौह रोग की उत्पत्ति और जरा को नष्ट करते हैं ॥ १३९–१४० ॥
अथ श्रेष्ठकान्तलौहस्य लक्षणम्—
पक्वजम्बूफलच्छायं कान्तलोहं तदुत्तमम् ॥ १४१ ॥
जो कान्तलोह पके हुए जामुन के समान वर्ण वाला हो वह श्रेष्ठ है ॥१४१॥
अथ लोहद्रुतिः—
त्रिःसप्तकृत्वो गोमूत्रे जालिनोभस्मभावितम्।
शोषयेत्तस्य वातेन तीक्ष्णं मूषागतं द्रवेत् ॥ १४२ ॥
सुरदालिभस्मगलितं त्रिःसप्तकृत्वोऽथ गोजले शुष्कम्।
वापेन सलिलसदृशं करोति मूषागतं तीक्ष्णम् ॥१४३ ॥