भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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पञ्चमोऽध्यायः । १८३

कड़वी तरोई की राख को २१ वार गोमूत्र से भावित कर के उसे सुखा लेवें फिर उस राख को मूषा में रखकर लौह भस्म को भर दें, ऊपर से लौह पर फिर शेष राख रखकर बन्द करके अग्नि से धमन करने से लौह का द्रवण हो जाता है। अथवा देवदाली की राख को २१ वार गोमूत्र से भावित कर सुखा लें, पश्चात् मूषा में वह भस्म रख कर के उस में लौहभस्म भर कर ऊपर से फिर लौह को देवदाली भस्म से ढक कर मूषा का मुख बन्दकर अग्नि से तपावे' । इस विधि से लौह की जल के सदृश द्रुति हो जाती है ॥ १४२-१४३ ॥

अथ कान्तलौहस्य विशेषमारणम्— सुरदालिभवं भस्म नरमूत्रेण गालितम् । त्रिःसप्तवारं तत्क्षारवापात्कान्तद्रुतिर्भवेत् ॥ १४४ ॥ देवदाली की राख को नरमूत्र से २१ वार भावितकर क्षारविधि से देवदाली भस्म का क्षार निकाल करके मूषायन्त्र में इस क्षार को और लौह भस्म को रख-कर बन्द करके तीव्र अग्नि देने से कान्तलौह की द्रुति हो जाती है ॥ १४४ ॥

अथाष्टलोहानां द्रावणम्— गन्धकं कान्तपाषाणं चूर्णयित्वा समं समम् । द्रुते लोहे प्रतीवापो देयो लोहाष्टकं द्रवेत् ॥ १४५ ॥ सुवर्णादि अष्ट प्रकारके किसी भी लोह को पिघला कर गन्धक और कान्तलौह या चुम्बक पत्थर का चूर्ण डालता जाय तो उन सब की द्रुति होजाती है॥१४५॥

मतान्तरम्— देवदाल्याद्रवैर्भाव्यं गन्धकं दिनसप्तकम् । तेन प्रवापमात्रेण लोहं तिष्ठति सूतवत् ॥ १४६ ॥ अथवा गन्धक को सात दिन तक देवदाली (हस्तीघोषक) के रस से भावित करके चूर्ण करलें, फिर लौहों के अग्नि में पिघलते समय इस चूर्ण का प्रतिवाप (प्रक्षेपण) देने से वे पारद की तरह सर्वदा द्रुत अवस्था में ही रहते हैं ॥१४६॥

अशुद्धापक्वलोहदोषाः— अशुद्धलोहं न हितं निषेवणादायुर्बलं कान्तिविनाशि निश्चितम् । हृदि प्रपीडां तनुते ह्यपाटवं रुजं करोत्येव विशोष्य मारयेत् ॥१४७॥ अशुद्ध लोह का सेवन करना हितकर नहीं है, यह कान्ति, आयु और बल को