भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

पृष्ठ 277, कुल 362 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 277

पञ्चमोऽध्यायः । १८७

स्वल्पस्वल्पाऽऽलकं दत्त्वा भारद्वाजस्य काष्ठतः । मर्दयित्वा चरेद्भस्म तद्रसादिशु शस्यते ॥ १६० ॥

अथवा किसी खर्पर (लौहपात्र) में वङ्ग को अग्निद्वारा पिघाल (द्रुत) करके उसमें षोडशांस शुद्ध पारद डालकर फिर उस में थोड़ा २ शुद्ध हरताल का चूर्ण डालताजाय और जङ्गली कपास के डण्डे से घोटता रहे, भस्म हो जाने पर उसका रसादिकायाँ में प्रयोग करे ॥ १६० ॥

मतान्तरम्— पलाशद्रवयुक्तेन वङ्गपत्रं प्रलेपयेत् । तालेन पुटितं पश्चान्प्रियते नात्र संशयः ॥ १६१ ॥

अथवा वङ्ग के पत्रों को पलाशपुष्प अथवा पलाशजड़ के स्वरस से लिप्त कर समान भाग शुद्ध हरताल का चूर्ण. मिलाकर के सम्पुट कर फूंकने से निश्चय हो वङ्ग की भस्म हो जाती है ॥ १६१ ॥

मतान्तरम्— भल्लाततैलसंलिप्तं वङ्गं वस्त्रेण वेष्टितम् । चिञ्चापिप्पलपालाशाकाष्ठाग्नौ याति पञ्चताम् ॥ १६२ ॥

अथवा शुद्ध वङ्ग के पत्रों को भिलावां के तैल से लिप्त करके ऊपर से साफ वस्त्र को लपेट दें, फिर उन्हें पीपल, इमली, पलाश, इन में से किसी एक की लकड़ियों की अग्नि में फूंकने से भस्म होजाती है ॥ १६२ ॥

अथ वङ्गरसायनम्— वङ्गभस्मसमं कान्तं व्योमभस्म च तत्समम् । मर्दयेत्कनकाम्भोभिर्निम्बपत्ररसैरपि ॥ १६३ ॥ दाडिमस्य मयूरस्य रसेन च पृथक् पृथक् । भूपालावर्तभस्माथ विनिक्षिप्य समांशकम् ॥ १६४ ॥ गोमूत्रकशिलाधातुजलैः सम्यग्विमर्दयेत् ॥ ततो गुग्गुलुतायेन मर्दयित्व दिनाष्टकम् ॥ १६५ ॥ विशोष्य परिचूर्ण्याथ समभागेन योजयेत् । घृष्टं बन्धुकनिर्या सैर्नकुलीबीजचूर्णकैः ॥ १६६ ॥ ततः क्षिपेत्करण्डान्तर्विधाय पटगालितम् ।