रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८८ | रसरत्नसमुच्चये—
गोतक्रपिष्टरजनीसारेण सह पाययेत् ॥ १६७ ॥
चतुभिर्वल्लकैस्तुल्यं रम्यं वङ्गरसायनम् ।
निश्चितं तेन नश्यन्ति मेहा विंशतिभेदकाः ॥ १६८ ॥
शालयो मुद्गसूपं च नवनीतं तिलोद्भवम् ।
पटोलं तिक्ततुण्डीरं तक्रं पथ्याय शस्यते ॥ १६९ ॥
इति वङ्गाधिकारः ।
वङ्ग भस्म के बराबर कान्त लौहभस्म और उतनी ही अभ्रक भस्म लेकर इन सब को खल्व में डालकर एक २ दिन तक धत्तूर और निम्बपत्र के स्वरस में मर्दन करना चाहिए, फिर इसी तरह दाड़िम के रस और अपामार्ग के रस से क्रमशः भावना देवें, पश्चात् इसमें वङ्ग के बराबर लाजवर्त की भस्म का एक भाग मिला कर के गोमूत्र और शिलाजीत के पानी से घोटें, फिर आठ दिन तक गूगल के पानी ( क्वाथ ) से घोट करके सुखालें, पश्चात् बन्धूकपुष्प ( गुलदपहरिया ) के स्वरस या गोंद से घोट कर भावना दें, फिर इसमें तुल्य रास्ना बीज या सेमल बीज का चूर्ण मिला कर के खल्व में घोटकर वस्त्र से छान शीशी में भर लें। फिर इस सुन्दर वङ्ग रसायन को ४ वल्ल की मात्रा से हल्दी के चूर्ण और गाय के तक्र के साथ सेवन करने से निश्चय ही बीस प्रकार के प्रमेह नष्ट हो जाते हैं। इस रसायनसेवन के साथ २ साठीचांवलों का भात, मूंग की दाल, नवनीत, (मक्खन) तिलतैल, परवर का शाक, करेले का शाक, कड़वी कन्दूरी या बिम्बीफल और तक्र ये पथ्य में लेना चाहिए ॥ १६३–१६९ ॥
अथ नागः—
शुद्धसीसकलक्षणम्—
द्रुतद्रावं महाभारं छेदे कृष्णसमुज्ज्वलम् ।
पूतिगन्धं बहिः कृष्णं शुद्धं सीसमतोऽन्यथा ॥ १७० ॥
जो सीस अग्नि में गर्म करने से शीघ्र पिघल ( द्रुत ) जाय, तोल में भारी, तोड़ने पर चमक लिये हुए कृष्ण वर्ण का हो, कुछ दुर्गन्ध युक्त हो, बाहर से देखने में काला हो वह औषध कार्य में श्रेष्ठ है इन लक्षणों से विपरीतलक्षण का नाग त्याज्य है ॥ १७० ॥