रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२० रसरत्नसमुच्चये—
पालिका कर्णिका चैव शाकच्छेदनशस्त्रकाः ॥ २१ ॥
शालासम्मार्जनार्थं हि रसपाकान्तकर्म यत् ।
तत्रापयोगि यच्चान्यत्तत्सर्वं परविद्यया ॥ २२ ॥
श्रीरसाङ्कुशया सर्वं मन्त्रयित्वा समर्चयेत् ।
अन्यथा तद्गतं तेजः परिगृह्णन्ति भैरवाः ॥ २३ ॥
सूप आदि बांस के बने हुए पात्र, छोटी २ सीपीं ( शुक्तियां ), छोटे २ शंख, छुरियां, पाक करने योग्य पात्र और जो कुछ वस्तु औषध कर्म में उपयुक्त समझी जाय वह तथा शाकादि काटने के शस्त्र पालिका, कर्णिका, रस-शाला का सम्मार्जन करने के लिये सम्मार्जनी ( झाडू ) आदि से लेकर पाककर्म तक जो कुछ भी उपकरण आवश्यक हों उनका संग्रह करके श्रेष्ठ जो रसांकुशी विद्या है उसके द्वारा उन सबको अभिमन्त्रित करके पूजें । इस तरह उनका पूज-नादिक नहीं करने से उनके अन्दर के तेज (शक्ति) को भैरव हर लेते हैं ॥२१-२३॥
अथ रसक्रियायां कीदृशा वैद्या अन्ये वा नियोज्यास्तत्कथनम्—
रससञ्चिन्तका वैद्या निघण्टुज्ञाश्च वार्तिकाः ।
सर्वदेशजभाषाज्ञाः सङ्ग्राह्यास्तेऽपि साधकैः ॥ २४ ॥
रस के साधक को जो वैद्य रससिद्धि के करने का विचार रखते हों और जो निघण्टु (औषधियों के नाम, लक्षण, गुण, दोष, प्रयोग) के उत्तम ज्ञान से सम्पन्न हों और जो वैद्य परिभाषा ( सांकेतिक शब्दार्थ ) तथा वार्तिक "उक्तानुक्तदुरुक्ता-र्थव्यक्तकारितुवार्त्तिकम्" के अर्थ को तथा सब देशों की भाषाओं को जानते हों उन वैद्यों का संग्रह करना चाहिए ॥ २४ ॥
अथ रसपाककाले मन्त्रजपस्य कर्त्तव्यतानिर्देशः—
रसपाकावसानं हि सदाऽघोरं च जापयेत् ॥ २५ ॥
जब तक रस का पाक होता रहे तब तक अघोर मन्त्र का किसी ब्राह्मण के द्वारा जप कराते रहना चाहिए ॥ २५ ॥
अथ परिचारकलक्षणम्—
सोद्यमाः शुचयः शूरा बलिष्ठाः परिचारकाः ॥ २६ ॥
जो परिचारक उद्योगशील, पवित्र, शूरवीर और बलवान् हों उन्हें रस के कार्य में नियुक्त करना चाहिए ॥ २६ ॥