रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः । २१९
जीवमयक्षीर, मूत्र, पुरीष, मूलमय वनौषधादिक औषधियों का भी संग्रह करना चाहिए। इनके अतिरिक्त शिखित्र, गोबर, बालुका, कठिनी ( सफेदा, रेता ) इनका भी संग्रह करे। जिस तरह कुम्भकार कच्चे घड़ों को पकाता है उसी तरह से लकड़ों के टुकड़ों के ढेर को ऊपर से बन्दकर भीतेर ही भीतर अग्नि द्वारा लकड़ियें पकाकर कोयले बनाये जाते हैं इन्हीं को प्रायः शिखित्र, कोकिला आदि नाम से कहते हैं। परन्तु मूलपाठ की संगति के लिये शिखित्र का स्वरूप इसतरह है जो अग्नि से जलकर शेष रहे हुए कोयले हैं वे शिखित्र कहलाते हैं और जो लकड़ी के टुकड़े कुम्भकार के आंवे की तरह अन्दर ही अन्दर अग्नि से जलकर पानी के बिना ही बुझ जाते हैं वे कोयले कहे जाते हैं ॥ १४-१६ ॥
उपलनामानि— पिष्टकं छागणं छाणमुपलं चोत्पलं तथा । गिरिण्डोपलसाठी च संशुष्कच्छागणाभिधाः ॥ १७ ॥
पिष्टक, छगण, छाण, उपल, उत्पल, गिरिण्डोपल और साठी ये सात नाम सूखे गोबर के हैं ॥ १७ ॥
कूपीनिर्माणद्रव्याणि— काचायोमृद्वराटानां कूपिका चषकानि च ॥ १८ ॥
काच, लौह, मिट्टी और कौड़ियें इनकी बनाई हुई शीशिएं तथा प्याले एकत्रित करे ॥ १८ ॥
कूपीपर्यायाः— कूपिका कुपिका सिद्धा गोला चैव गिरिण्डिका ॥ १९ ॥
शीशियों के नाम कूपिका, कुपिका, सिद्धा, गोला, गिरिण्डिका ये हैं ॥ १९ ॥
अथ चषकस्य पर्यायाः— चषकं च कटोरी च वाटिका खारिका तथा । कञ्चोली ग्राहिका चेति नामान्येकार्थकानि हि ॥ २० ॥
चषक, कटोरी, वाटिका, खारिका, कंचोली, और ग्राहिका ये नाम परस्पर एकार्थ को कहते हैं ॥ २० ॥
शूर्पादीनां समर्चनम्— शूर्पादिवेणुपात्राणि क्षुद्रशिप्राश्च शङ्खिकाः । क्षुरप्राश्च तथा पाक्यः यच्चान्यत्तत्र युज्यते ॥