भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

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२१८ | रसरत्नसमुच्चये—

हुई कुण्डलियां, इत्यादि पदार्थों का संग्रह करना चाहिए ॥ ५-९ ॥

चालनीभेदलक्षणादिकम्—

चालनी त्रिविधा प्रोक्ता तत्स्वरूपं च कथ्यते ।
वैणवीभिः शलाकाभिर्निर्मिता ग्रथिता गुणैः ।
कीर्तिता सा सदाऽस्थूलद्रव्याणां गालने हिता ॥ १० ॥
चूर्णचालनहेतोश्च चालन्यन्यापि वंशजा ॥ ११ ॥
कर्णिकारस्य शाल्मल्या हरिजातस्य कम्बया ।
चतुरङ्गुलविस्तारयुक्तया निर्मिता शुभा ॥ १२ ॥
कुण्डल्यरत्निविस्तारा छागचर्माभिवेष्टिता ।
वाजिवालाम्बरानद्धतला चालनिका परा ॥
तया प्रचालनं कुर्याद्धर्तुं सूक्ष्मतरं रजः ॥ १३ ॥

औषध चूर्ण को छानने वाली चालनी तीन तरह की होती है । आगे उनका स्वरूप लिखते हैं यथा बांसों की सलियों से बनी हुई और मजबूत धागे से बंधी हुई जो चालनी होती है वह मोटे २ द्रव्यों के चालने के लिये उपयोगी होती है । दूसरी चालनी भी बांस ही से बनाई जाती है उसके द्वारा चूर्ण वगैरह छानना चाहिए । एक तीसरी चलनी होती है जो कि अमलतास, सेमल और चन्दन या बांस के कम्ब ( वल्कल ) से बनाई जाती है जो कि चार अङ्गुल ऊंची और उसकी चौड़ाई लम्बाई एक बैंत ( वालिस्त ) होनी चाहिए और बकरे के चर्म से चारों ओर मढकर के उसके तलभाग में घोड़े के बाल या वस्त्र बांधना चाहिए, इसके द्वारा औषधियों के छोटे २ चूर्ण को चालते हैं ॥ १०-१३ ॥

रससिद्धावुपकरणानि—

मूषा-मृत्तुष-कार्पासवनोपलकपिष्टकम् ।
त्रिविधं भेषजं धातुजीवमूलमयं तथा ॥ १४ ॥
शिखित्रा गोवरं चैव शर्करा च सितोपला ।
शिखित्राः पावकोच्छिष्टा अङ्गारा कोकिला मताः ॥ १५ ॥
कोकिलाश्चेतिताङ्गारा निर्वाणाः पयसा विना ॥ १६ ॥

पांचों प्रकार की मिट्टी, मूषा, तुष ( जो गेहूं आदि की भूसी ), कार्पास ( रुई या बिनौले ), जंगलीकण्डे, तण्डुलपिष्ट और तीन प्रकार की धातु स्वर्णादि,