रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
२१८ | रसरत्नसमुच्चये—
हुई कुण्डलियां, इत्यादि पदार्थों का संग्रह करना चाहिए ॥ ५-९ ॥
चालनीभेदलक्षणादिकम्—
चालनी त्रिविधा प्रोक्ता तत्स्वरूपं च कथ्यते ।
वैणवीभिः शलाकाभिर्निर्मिता ग्रथिता गुणैः ।
कीर्तिता सा सदाऽस्थूलद्रव्याणां गालने हिता ॥ १० ॥
चूर्णचालनहेतोश्च चालन्यन्यापि वंशजा ॥ ११ ॥
कर्णिकारस्य शाल्मल्या हरिजातस्य कम्बया ।
चतुरङ्गुलविस्तारयुक्तया निर्मिता शुभा ॥ १२ ॥
कुण्डल्यरत्निविस्तारा छागचर्माभिवेष्टिता ।
वाजिवालाम्बरानद्धतला चालनिका परा ॥
तया प्रचालनं कुर्याद्धर्तुं सूक्ष्मतरं रजः ॥ १३ ॥
औषध चूर्ण को छानने वाली चालनी तीन तरह की होती है । आगे उनका स्वरूप लिखते हैं यथा बांसों की सलियों से बनी हुई और मजबूत धागे से बंधी हुई जो चालनी होती है वह मोटे २ द्रव्यों के चालने के लिये उपयोगी होती है । दूसरी चालनी भी बांस ही से बनाई जाती है उसके द्वारा चूर्ण वगैरह छानना चाहिए । एक तीसरी चलनी होती है जो कि अमलतास, सेमल और चन्दन या बांस के कम्ब ( वल्कल ) से बनाई जाती है जो कि चार अङ्गुल ऊंची और उसकी चौड़ाई लम्बाई एक बैंत ( वालिस्त ) होनी चाहिए और बकरे के चर्म से चारों ओर मढकर के उसके तलभाग में घोड़े के बाल या वस्त्र बांधना चाहिए, इसके द्वारा औषधियों के छोटे २ चूर्ण को चालते हैं ॥ १०-१३ ॥
रससिद्धावुपकरणानि—
मूषा-मृत्तुष-कार्पासवनोपलकपिष्टकम् ।
त्रिविधं भेषजं धातुजीवमूलमयं तथा ॥ १४ ॥
शिखित्रा गोवरं चैव शर्करा च सितोपला ।
शिखित्राः पावकोच्छिष्टा अङ्गारा कोकिला मताः ॥ १५ ॥
कोकिलाश्चेतिताङ्गारा निर्वाणाः पयसा विना ॥ १६ ॥
पांचों प्रकार की मिट्टी, मूषा, तुष ( जो गेहूं आदि की भूसी ), कार्पास ( रुई या बिनौले ), जंगलीकण्डे, तण्डुलपिष्ट और तीन प्रकार की धातु स्वर्णादि,
सप्तमोऽध्यायः । २१९
सप्तमोऽध्यायः । २१९
जीवमयक्षीर, मूत्र, पुरीष, मूलमय वनौषधादिक औषधियों का भी संग्रह करना चाहिए। इनके अतिरिक्त शिखित्र, गोबर, बालुका, कठिनी ( सफेदा, रेता ) इनका भी संग्रह करे। जिस तरह कुम्भकार कच्चे घड़ों को पकाता है उसी तरह से लकड़ों के टुकड़ों के ढेर को ऊपर से बन्दकर भीतेर ही भीतर अग्नि द्वारा लकड़ियें पकाकर कोयले बनाये जाते हैं इन्हीं को प्रायः शिखित्र, कोकिला आदि नाम से कहते हैं। परन्तु मूलपाठ की संगति के लिये शिखित्र का स्वरूप इसतरह है जो अग्नि से जलकर शेष रहे हुए कोयले हैं वे शिखित्र कहलाते हैं और जो लकड़ी के टुकड़े कुम्भकार के आंवे की तरह अन्दर ही अन्दर अग्नि से जलकर पानी के बिना ही बुझ जाते हैं वे कोयले कहे जाते हैं ॥ १४-१६ ॥
उपलनामानि— पिष्टकं छागणं छाणमुपलं चोत्पलं तथा । गिरिण्डोपलसाठी च संशुष्कच्छागणाभिधाः ॥ १७ ॥
पिष्टक, छगण, छाण, उपल, उत्पल, गिरिण्डोपल और साठी ये सात नाम सूखे गोबर के हैं ॥ १७ ॥
कूपीनिर्माणद्रव्याणि— काचायोमृद्वराटानां कूपिका चषकानि च ॥ १८ ॥
काच, लौह, मिट्टी और कौड़ियें इनकी बनाई हुई शीशिएं तथा प्याले एकत्रित करे ॥ १८ ॥
कूपीपर्यायाः— कूपिका कुपिका सिद्धा गोला चैव गिरिण्डिका ॥ १९ ॥
शीशियों के नाम कूपिका, कुपिका, सिद्धा, गोला, गिरिण्डिका ये हैं ॥ १९ ॥
अथ चषकस्य पर्यायाः— चषकं च कटोरी च वाटिका खारिका तथा । कञ्चोली ग्राहिका चेति नामान्येकार्थकानि हि ॥ २० ॥
चषक, कटोरी, वाटिका, खारिका, कंचोली, और ग्राहिका ये नाम परस्पर एकार्थ को कहते हैं ॥ २० ॥
शूर्पादीनां समर्चनम्— शूर्पादिवेणुपात्राणि क्षुद्रशिप्राश्च शङ्खिकाः । क्षुरप्राश्च तथा पाक्यः यच्चान्यत्तत्र युज्यते ॥
२२० रसरत्नसमुच्चये—
पालिका कर्णिका चैव शाकच्छेदनशस्त्रकाः ॥ २१ ॥
शालासम्मार्जनार्थं हि रसपाकान्तकर्म यत् ।
तत्रापयोगि यच्चान्यत्तत्सर्वं परविद्यया ॥ २२ ॥
श्रीरसाङ्कुशया सर्वं मन्त्रयित्वा समर्चयेत् ।
अन्यथा तद्गतं तेजः परिगृह्णन्ति भैरवाः ॥ २३ ॥
सूप आदि बांस के बने हुए पात्र, छोटी २ सीपीं ( शुक्तियां ), छोटे २ शंख, छुरियां, पाक करने योग्य पात्र और जो कुछ वस्तु औषध कर्म में उपयुक्त समझी जाय वह तथा शाकादि काटने के शस्त्र पालिका, कर्णिका, रस-शाला का सम्मार्जन करने के लिये सम्मार्जनी ( झाडू ) आदि से लेकर पाककर्म तक जो कुछ भी उपकरण आवश्यक हों उनका संग्रह करके श्रेष्ठ जो रसांकुशी विद्या है उसके द्वारा उन सबको अभिमन्त्रित करके पूजें । इस तरह उनका पूज-नादिक नहीं करने से उनके अन्दर के तेज (शक्ति) को भैरव हर लेते हैं ॥२१-२३॥
अथ रसक्रियायां कीदृशा वैद्या अन्ये वा नियोज्यास्तत्कथनम्—
रससञ्चिन्तका वैद्या निघण्टुज्ञाश्च वार्तिकाः ।
सर्वदेशजभाषाज्ञाः सङ्ग्राह्यास्तेऽपि साधकैः ॥ २४ ॥
रस के साधक को जो वैद्य रससिद्धि के करने का विचार रखते हों और जो निघण्टु (औषधियों के नाम, लक्षण, गुण, दोष, प्रयोग) के उत्तम ज्ञान से सम्पन्न हों और जो वैद्य परिभाषा ( सांकेतिक शब्दार्थ ) तथा वार्तिक "उक्तानुक्तदुरुक्ता-र्थव्यक्तकारितुवार्त्तिकम्" के अर्थ को तथा सब देशों की भाषाओं को जानते हों उन वैद्यों का संग्रह करना चाहिए ॥ २४ ॥
अथ रसपाककाले मन्त्रजपस्य कर्त्तव्यतानिर्देशः—
रसपाकावसानं हि सदाऽघोरं च जापयेत् ॥ २५ ॥
जब तक रस का पाक होता रहे तब तक अघोर मन्त्र का किसी ब्राह्मण के द्वारा जप कराते रहना चाहिए ॥ २५ ॥
अथ परिचारकलक्षणम्—
सोद्यमाः शुचयः शूरा बलिष्ठाः परिचारकाः ॥ २६ ॥
जो परिचारक उद्योगशील, पवित्र, शूरवीर और बलवान् हों उन्हें रस के कार्य में नियुक्त करना चाहिए ॥ २६ ॥
सप्तमोऽध्यायः । .२२१
पद्महस्तवैद्यलक्षणम्—
धर्मिष्ठः सत्यवाग्विद्वान् शिवकेशवपूजकः ।
सदयः पद्महस्तश्च संयोज्यो रसवैद्यके ॥ २७ ॥
जो धर्म में तत्पर, सत्य बोलने वाला, रसशास्त्र का विद्वान् और शिव, विष्णु का भक्त, दयावान् तथा जिसके हाथ में कमल का चिन्ह हो वह पद्महस्त वैद्य है उसको रससिद्धि करने में नियुक्त करें ॥ २७ ॥
अमृतहस्तवैद्यलक्षणम्—
पताकाकुम्भपाथोजमत्स्यचापाङ्कपाणिकः ।
अनामाधस्थरेखाङ्कः सस्यादमृतहस्तवान् ॥ २८ ॥
जिस के हस्त में ध्वजा, घट, कमल, मत्स्य और धनुष इनका चिन्ह हो तथा जिसकी अनामिका अङ्गुली के मूल में रेखाएं हों वह अमृतहस्त वैद्य कहलाता है ॥ २८ ॥
दग्धहस्तवैद्यस्य लक्षणम्—
अदेशिकः कृपामुक्तो लुब्धो गुरुविवर्जितः ।
कृष्णरेखाकरो वैद्यो दग्धहस्तः स उच्यते ॥ २९ ॥
जो अन्य देश से आया हो तथा दयारहित, लोभी, गुरुदीक्षा से रहित हो तथा जिसके हाथ में काली रेखा हो वह वैद्य दग्धहस्त कहलाता है, उसको रसकर्म में नियुक्त नहीं करना चाहिए ॥ २९ ॥
निधिरक्षायोग्यपुरुषाः—
भूतनिग्रहमन्त्रज्ञास्ते योज्या निधिसाधने ॥ ३० ॥
भूत, प्रेत, पिशाचादि को दूर करने या वशमें करने के मन्त्र जो जानते हों उन्हें सिद्ध भस्म, पाक आदि की रक्षा के लिये नियुक्त करना चाहिए ॥ ३० ॥
अथ बलिसाधने नियोज्यपुरुषलक्षणम्—
बलिष्ठाः सत्यवन्तश्च रक्ताक्षाः कृष्णविग्रहाः ।
भूतत्रासनविद्याश्च ते योज्या बलिसाधने ॥ ३१ ॥
जो पुरुष बलवान् , सत्यवादी, लालनेत्र और काले शरीर के हों और जो भूत प्रेतों को डराने वाली विद्या को जानते हों उन्हें बलिदान करने के कार्य में नियुक्त करना उत्तम है ॥ ३१ ॥
२२२ | रसरत्नसमुच्चये—
अथ रसायने नियोज्यपुरुषलक्षणम्—
निर्लोभाः सत्यवक्तारो देवब्राह्मणपूजकाः ।
यमिनः पथ्यभोक्तारो योजनीया रसायने ॥ ३२ ॥
जो मनुष्य लोभरहित, सत्यवक्ता, देवता और ब्राह्मणों के पूजक, इन्द्रियनिग्रहशील और पथ्यभोजी हों उनको रससिद्धि में नियुक्त करें ॥ ३२ ॥
स्वर्णादिधातुसिद्धिनियुक्तियोग्यपुरुषाः—
धनवन्तो वदान्याश्च सर्वोपस्करसंयुताः ।
गुरुवाक्यरता नित्यं धातुवादेषु ते शुभाः ॥ ३३ ॥
जो पुरुष धनाढ्य, दान करने वाले तथा गुरु के वचनों का पालन करते हों उन्हें स्वर्ण, रौप्य आदि धातुओं के शोधन और मारण कर्म में नियुक्त करें ॥ ३३ ॥
अथ भेषजाहरणे नियोज्यपुरुषलक्षणम्—
तत्तदौषधनामज्ञाः शुचयो वञ्चनोज्झिताः ।
नानाविषयभाषाज्ञास्ते मता भेषजाहृतौ ॥ ३४ ॥
जो मनुष्य सब औषधियों के नाम को भलिभांति जानते हों और पवित्र, धूर्ततारहित तथा सबदेश की भाषा से परिचित हों उन्हें औषधियां लाने के लिये नियुक्त करना चाहिए ॥ ३४ ॥
अथ केषां रससिद्धिर्भवतीत्याह—
शुचीनां सत्यवाक्यानामास्तिकानां मनस्विनाम् ।
सन्देहोज्झितचित्तानां रसः सिद्ध्यति सर्वदा ॥ ३५ ॥
जिन की अन्तरात्मा, मन, कर्म और शरीर शुद्ध हो तथा जो सत्यवादी, आस्तिक (इहलोक, परलोक, आत्मा, परमात्मा इत्यादि के अस्तित्व का ज्ञान रखने वाले ), मन को जीतने वाले, रसादिसिद्धि के सन्देह से रहित हों उन्हीं को पारदकी सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ३५ ॥
अथ रससिद्धसाधकस्य कर्त्तव्यनिर्देशः—
दशाष्टक्रियया सिद्धो रसोऽसौ साधकोत्तमः ।
हा रसो नष्टमित्युक्त्वा सेवेतान्यत्र तं रसम् ॥ ३६ ॥
जो पुरुष स्वेदनमर्दनादि १८ संस्कारों के द्वारा रस को सिद्ध कर लेता है वह रस के साधकों में उत्तम साधक है तथा वह रस मूर्च्छना वगैरह से मृत हो गया
सप्तमोऽध्यायः । २२३
इस तरह का विषाद कर फिर किसी अन्य स्थान में रस साधन का कर्म प्रारम्भ कर देता है ॥ ३६ ॥
**विमर्शः—**कुछ पुस्तकों में "हारसोनए" के स्थान में 'महारसोऽयमित्युक्त्वा, ऐसा पाठ है वह भी ठीक है, उसका अर्थ यह महारस है ऐसा कह कर उसका सेवन करें। जहां पर "सिद्धो रसः" के स्थान में "सिद्धे रसे" ऐसा पाठ है वहां का अर्थ 'रस के सिद्ध होने पर यह है। यदि कोई शङ्का करे कि रस के सिद्ध होने पर उसके विषय में विषाद क्यों किया जाता है। उत्तर—जिस तरह राम, युधिष्ठिर आदि महापुरुष शत्रुओं को मार कर भी उनके लिये विषाद करते हैं वैसे ही यहां पर भी विषाद करना असङ्गत नहीं है ॥
रससिद्धमर्त्यफलम्— रससिद्धो भवेन्मर्त्यो दाता भोक्ता न याचकः । जरामुक्तो जगत्पूज्यो दिव्यकान्तिः सदा सुखी ॥ ३७ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये रसशालाप्रकरणं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
जो पुरुष रससिद्धि प्राप्त कर लेता है वह दाता, भोक्ता, संसार का पूज्य, जरा (बुढौती) से रहित, दिव्य कान्ति से युक्त और सर्वदा सुखी रहता है और वह किसी के पास याचक बन कर मांगने नहीं जाता है अर्थात् उसके पास सब सिद्धिएं आजाती हैं ॥ ३७ ॥
इति श्रीकृष्णात्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्जवलाख्य-भाषाटीकायां रसशालानिरूपणं नाम सप्तमोऽध्यायः ।
२२४ रसरत्नसमुच्चये—
अथ अष्टमोऽध्यायः ॥
अथ परिभाषा—
कथ्यते सोमदेवेन मुग्धवैद्यप्रबुद्धये ।
परिभाषा रसेन्द्रस्य शास्त्रैः सिद्धैश्च भाषिता ॥ १ ॥
अब सोमदेव नामक रसशास्त्र के आचार्य, अल्प मति वैद्यों को सहज में ज्ञान हो जाय इसलिये शास्त्र और सिद्ध पुरुषों से कही हुई रस सम्बन्धी परिभाषा को कहते हैं ॥ १ ॥
धन्वन्तरिभागः—
अर्धं सिद्धरसस्य तैलघृतयोर्लेहस्य भागोऽष्टमः
संसिद्धाखिललोहचूर्णवटकादीनां तथा सप्तमः ।
यो दीयेत भिषग्वराय गदिभिर्निर्दिश्य धन्वन्तरिम् ।
सर्वाऽऽरोग्यसुखाप्तये निगदितो भागः स धन्वन्तरेः ॥ २ ॥
जो रोगी अपने रोगमुक्ति के लिये तथा आरोग्य और सुखप्राप्ति के निमित्त वैद्य के द्वारा अपने द्रव्य से औषध निर्माण कराकर उसमें से निर्माता वैद्य को जारणमारणादिविधि से सिद्ध हुए रस और सिद्धकिये हुए घृत, तैल का आधाभाग, अवलेह का आठवांभाग, सिद्ध हुए सप्तलोह, चूर्ण, वटक इत्यादि में से सप्तमांश (सातवां) भाग धन्वन्तरि के निमित्त देता है वह धन्वन्तरि का भाग कहलाता है ॥२॥
रुद्रभागः—
भैषज्यक्रीणितद्रव्यभागोऽप्येकादशो हि यः ।
वणिग्भ्यो गृह्यते वैद्यै रुद्रभागः स उच्यते ॥ ३ ॥
औषधि के लिये खरीदे हुए द्रव्यों में का व्यापारियों से जो ग्यारहवां भाग वैद्य लेते हैं वही रुद्रभाग कहलाता है ॥ ३ ॥
अथ विश्वासघातकवैद्यलक्षणम्—
प्रगृह्याऽधिकरुद्रांशं योऽसमीचीनमौषधम् ।
दापयेल्लुब्धधीर्वैद्यः स स्याद्विश्वासघातकः ॥ ४ ॥
जो लोभी वैद्य अधिक मात्रा से रुद्रभाग लेकर खराब औषधि को श्रेष्ठ कह कर देता है या अन्य से दिला देता है वह वैद्य विश्वासघातक है ॥ ४ ॥
अष्टमोऽध्यायः ।
२२५
अथ कज्जली—
धातुभिर्गन्धकाद्यैश्च निर्द्रवैर्मर्दितो रसः ।
सुश्लक्ष्णः कज्जलाभोऽसौ कज्जलीत्यभिधीयते ॥ ५ ॥
गन्धक आदि धातुओं के साथ पारद को किसी द्रवपदार्थ (अम्लरस इत्यादि) के बिना ही घोटकर उसका अत्यन्त चिकना और कज्जल के समान काला चूर्ण तैयार करते हैं उसी को कजली कहते हैं ॥ ५ ॥
अथ रसपङ्कः—
सद्रवा मर्दिता सैव रसपङ्क इति स्मृतः ॥ ६ ॥
यदि उपर्युक्तविधि से बनी कज्जली में द्रवपदार्थ मिलाकर घोटा जाय तब उसको रसपङ्क कहते हैं ॥ ६ ॥
अथ पिष्टी—
अर्कांशतुल्याद्रसतोऽथगन्धान्निष्कार्धतुल्यात्त्रुटिशोऽभिखल्ले ।
अर्कातपे तीव्रतरे विमर्द्यात् पिष्टीभवेत्सा नवनीतरूपा ॥ ७ ॥
आधा निष्क ( २ माषा ) गन्धक और गन्धक से द्वादशांश (१२ वां भाग) शुद्ध पारद लेकर खरल में डालकर तेजधूप में घोटना चाहिए । जब घोटते २ मक्खन के समान चिकना चूर्ण होजाय तब उसको पिष्टि कहते है ॥ ७ ॥
मतान्तरम्—
खल्ले विमर्द्य गन्धेन दुग्धेन सह पारदम् ।
पेषणात्पिष्टतां याति सा पिष्टीति मता परैः ॥ ८ ॥
खरल के अन्दर दुग्ध के साथ बराबर २ शुद्ध पारद तथा गन्धक को घोटने से जब वह पिष्टि के रुप में हो जाय तब पिष्टि कहलाती है। यह भी अन्य आचार्य का मत है ॥ ८ ॥
अथ पातनपिष्टी—
चतुर्थांशसुवर्णेन रसेन घृष्टपिष्टिका ।
भवेत्पातनपिष्टी सा रसस्योत्तमसिद्धिदा ॥ ९ ॥
एक भाग शुद्ध पारद को चौथाई भाग सुवर्ण पत्रों के साथ घोटने से जो पिष्टी ( कज्जली ) तैयार होती है उसको पातन पिष्टी कहते हैं ( अर्थात् सुवर्ण के साथ इस तरह पारद को घोटकर पिष्टि बना के उसका उर्ध्वपातन करते हैं ) । इससे पारद के अन्दर अनेक गुणों का आधान होता है ॥ ९ ॥
रस० १५
२२६ :रसरत्नसमुच्चये—
अथ स्वर्णरौप्ययोः कृष्टिः—
रूप्यं वा जातरूपं वा रसगन्धादिभिर्हतम् ।
समुत्थितं च बहुशः सा कृष्टी हेमतारयोः ॥ १० ॥
पारद और गन्धक आदि के द्वारा भस्म किये हुए स्वर्ण तथा रजत को उर्ध्व-पातन यन्त्र द्वारा अनेक औषधियों से जो पुनरुत्थापित कहते हैं, वह स्वर्ण और रजत की कृष्टी कही जाती है ॥ १० ॥
अथ कृष्ट्या उपयोगः—
कृष्टीं क्षिपेत्सुवर्णांन्तर्न वर्णो हीयते तया ॥ ११ ॥
उक्तविधि से की हुई स्वर्ण या रौप्य की कृष्टी को अग्निपर गलाकर स्वर्ण में मिलाने से स्वर्ण का रङ्ग कम नहीं होता है ॥ ११ ॥
स्वर्णकृष्ट्याः कार्यम्—
स्वर्णकृष्ट्या कृतं बीजं रसस्य परिरञ्जनम् ॥ १२ ॥
स्वर्ण कृष्टी से किया हुआ बीज (बनाने की विधि आगे है) पारद का रञ्जन करता है ॥ १२ ॥
अथ वरलोहकम्—
ताम्रं तीक्ष्णसमायुक्तं द्रुतं निक्षिप्य भूरिशः ।
सगन्धलकुचद्रावे निर्गतं वरलोहकम् ॥ १३ ॥
तीक्ष्णलौह तथा ताम्र को बहुतवार (प्रायः ७ वार) साथ ही पिघलाकर गन्धक के चूर्ण को बड़हल के रस में मिलाकर उसमें बुझाने से लोह को वरलोह कहा जाता है ॥ १३ ॥
अथ हेमरक्ती—
तेन रक्तीकृतं स्वर्णं हेमरक्तीत्युदाहृतम् ॥ १४ ॥
इस वरलोह के साथ स्वर्ण को पिघलाने से वह उत्तम लालवर्ण का हो जाता है उसको हेमरक्ती कहते हैं ॥ १४ ॥
हेमरक्तीप्रयोगः—
निक्षिप्ता सा द्रुते स्वर्णे स्वर्णोत्कर्षविधायिनी ।
तारस्य रञ्जनी चापि बीजरागविधायिनी ॥ १५ ॥
यह हेमरक्ती पिघले हुए स्वर्ण के साथ डालकर उसमें मिलाने से उसका रङ्ग
अष्टमोऽध्यायः । २२७
अष्टमोऽध्यायः । २२७
श्रेष्ठ बनादेती है तथा चांदी को रङ्ग देती है और उसके बीजराग को भी बनाती है॥१५॥
अथ ताररक्ती— एवमेव प्रकर्तव्या ताररक्ती मनोहरा । रञ्जनी खलु रूप्यस्य बीजानामपि रञ्जनी ॥ १६ ॥ हेमरक्ती की तरह वरलोह के साथ चांदी को गला कर ताररक्ती बनाते हैं, यह ताररक्ती चांदी को तथा चांदी के बीजों को भी रङ्ग देती है ॥ १६ ॥
अथ दलम्— मृतेन वा बद्धरसेन वाऽन्यल्लोहेन वा साधितमन्यलोहम् । सितं च पीतत्वमुपागतं तद्दलं हि चन्द्रानलयोः प्रसिद्धम् ॥१७॥ भस्महुए पारद अथवा निगडीकरण क्रिया द्वारा संयमित ( बद्ध ) पारद के साथ या किसी अन्य लोह आदि धातु के साथ सिद्ध की हुई कोई धातु जब श्वेत वर्ण की होजाती है तब उसको चन्द्रदल कहते हैं और जब वह पीतवर्ण की होजाती है तब उसको अग्निदल कहते हैं ॥ १७ ॥
अथ अन्यविधदलम्— आमासकृतबद्धेन रसेन सह योजितम् । साधितं वाऽन्यलोहेन सितं पीतं च तद्दलं ॥ १८ ॥ एक मास तक रस को निगडीकरण क्रिया द्वारा बद्ध करके उस (बद्ध हुए) के साथ या उसकी भस्म के साथ या किसी अन्य लोह के साथ सिद्ध की हुई किसी धातु को श्वेत होनेपर सितदल और पीत होने पर पीतदल कहते हैं ॥१८॥
अथ शुल्वनागम्— माक्षिकेण हतं ताम्रं दशवारं समुत्थितम् । तद्वद्विशुद्धनागं हि द्वितयं तच्चतुष्पलम् ॥ १६ ॥ नीलाञ्जनहतं भूयः सप्तवारं समुत्थितम् । इति संसिद्धमेतद्धि शुल्वनागं प्रकीर्त्यते ॥ २० ॥ शुद्ध स्वर्णमाक्षिक चूर्ण के साथ शुद्ध ताम्र की भस्म बनाकर उसको उत्थापित करें, इस तरह फिर उस उत्थापित ताम्र की शुद्धस्वर्ण माक्षिक के साथ भस्म बनाकर उसको पुनः उत्थापित करें इसी प्रकार से यह क्रिया दसवार करनी चाहिए । शुद्ध नाग को भी शुद्धस्वर्णमाक्षिक के साथ भस्म करके उत्थापित करें इस तरह
२२८ रसरत्नसमुच्चये—
इसको भी दसवार भस्म बनाकर उत्थापित करना चाहिए। पश्चात् इस नाग और ताम्र को चारपलकी मात्रा में ग्रहणकर नीलाञ्जन के साथ भस्म करके उत्थापन करें। इस तरह भस्म करके सात वार उत्थापन करना चाहिए। इस क्रिया से शुद्ध नाग और ताम्र को शुल्बनाग कहते हैं ॥ १९-२० ॥
अथ शुल्बनागगुणाः—
सान्निस्तेन सूतेन्द्रो वदने विधृतो नृणाम् ।
निहन्ति मासमात्रेण मेहव्यूहं विशेषतः ॥ २१ ॥
पथ्याशनस्य वर्षेण पलितं वलिभिः सह ।
गृध्रदृष्टिर्लसत्पुष्टिसर्वारोग्यसमन्वितः ॥ २२ ॥
इस शुल्बनाग के साथ पारद की भस्म बना करके गोली बनाकर एक मास तक मुख में धारण करने से मनुष्यों के बीस प्रकार के प्रमेह नष्ट हो जाते हैं, इसी तरह जो मनुष्य पथ्य का पालन करता हुआ एक वर्ष तक इस गोली को मुख में धारण करता रहे तो उसके वली (युवावस्था में ही मुख तथा अन्य अङ्ग के चर्म में झुर्रियों का पड़ना) और पलित (असमय में बालों का सफेद होना) रोग नष्ट हो जाते हैं तथा उस मनुष्य की अवलोकन शक्ति (दृष्टि) गृध्र के समान बढ़ जाती है, शरीर पुष्ट हो जाता है, तथा उसका शरीर सब तरह से नीरोग होजाता है ॥ २१-२२ ॥
अथ पिञ्जरी—
लोहं लोहान्तरे क्षिप्तं ध्मातं निर्वापितं द्रवे ।
पाण्डुपीतप्रभं जातं पिञ्जरीत्यभिधीयते ॥ २३ ॥
एक धा को अन्य धातु के साथ मिलाकर अग्नि में विद्रुत करके किसी त्रिफला इत्यादि के क्वाथ में बुझाने ने से यदि वह धातु पाण्डुवर्ण लिये हुई पीत वर्ण की हो जाय तब उसको पिञ्जरी कहते हैं ॥ २३ ॥
अथ चन्द्रार्कम्—
भागाः षोडश तारस्य यथा द्वादश भास्वतः ।
एकत्रावर्तितास्तेन चन्द्रार्कंमिति कथ्यते ॥ २४ ॥
चांदी १६ भाग और ताम्र १२ भाग लेकर दोनों को अग्नि में विद्रुत करके घोटकर जो रस तैयार होता है उसको चन्द्रार्क कहते हैं ॥ २४ ॥
अष्टमोऽध्यायः । २२९
अष्टमोऽध्यायः । २२९
अथ निर्वापणम्—
साध्यलोहेऽन्यलोहं चेत्प्रक्षिप्तं वङ्कनालतः ।
निर्वापणं तु तत्प्रोक्तं वैद्यैर्निर्वाहिणं खलु ॥ २५ ॥
अग्नि में विद्रुत हुई धातु में अन्य धातु को विद्रुत कर वङ्कनाल द्वारा डालने को निर्वापण कहते हैं और उसी का पर्याय वैद्य जनोने निर्वाहिण भी कहा है॥ २५॥
निर्वापणद्रव्यमात्रा—
क्षिपेन्निर्वापणं द्रव्यं निर्वाह्ये समभागिकम् ।
आवाह्यं वापनीये च भागे दृष्टे च दृष्टवत् ॥ २६ ॥
साध्य लोह में निर्वापण द्रव्य की मात्रा साध्य लोह के बराबर ही होनी चाहिए अथवा जैसी निर्वापण द्रव्य की मात्रा गुरुपरम्परा से सीखी या देखी हो उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए ॥ २६ ॥
अथ वारितरलोहलक्षणम्—
मृतं तरति यत्तोये लोहं वारितरं हि तत् ॥ २७ ॥
जो धातु फूंकने के पश्चात् अर्थात् उस धातु की भस्म जल पर तैरती रहे उसमें डूबे नहीं उसको वारितरभस्म या लोह कहते हैं ॥ २७ ॥
मृतलोहलक्षणम्—
अङ्गुष्ठतर्जनीघृष्टं यत्तद्रेखान्तरे विशेत् ।
मृतलोहं तदुद्दिष्टं रेखापूर्णाभिधानतः ॥ २८ ॥
किसी भी लोह (सप्तलोह) की भस्म को अङ्गुष्ठ तथा तर्जनी अङ्गुली के बीच में लेकर घर्षित करने से यदि वह भस्म उन दोनों की रेखाओं में प्रविष्ट हो जाय तथा नीचे नहीं गिरे तब उस धातु की भस्म को मृतलोह अथवा रेखापूर्ण नाम से कहते हैं ॥ ॥ २८ ॥
अपुनर्भव लक्षणम्—
गुडगुञ्जासुखस्पर्श मध्वाज्यैः सह योजितम् ।
नायाति प्रकृतिं ध्मानादपुनर्भवमुच्यते ॥ २९ ॥
गुड़, गुञ्जाचूर्ण, सुहागा, शहद, घृत, इनके साथ किसी भी धातु की भस्म को मिलाकर अग्नि में फूंकने से यदि वह अपने स्वरूप को धारण नहीं करे तब उसको अपुनर्भव भस्म कहते हैं ॥ २९ ॥
२३० रसरत्नसमुच्चये—
उत्तमभस्मलक्षणम्—
तस्योपरि गुरु द्रव्यं धान्यं चोपनयेद्ध्रुवम् ।
हंसवत्तीर्यते वारिण्युत्तमं परिकीर्तितम् ॥ ३० ॥
फिर इस भस्म को जल पर तैराकर इसके ऊपर कोई वजनी पदार्थ अथवा धान के दाने रखने से यदि वह जल में डूबे नहीं और हंस के समान उस भस्म के सहारे तैरती रहे तब वह उत्तम भस्म होती है। कुछ ग्रन्थकरों ने इसको ऊनम भस्म भी कहा है ॥ ३० ॥
निरुत्थलौहलक्षणम्—
रौप्येन सह संयुक्तं ध्मातं रौप्येन चेल्लगेत् ।
तदा निरुत्थमित्युक्तं लोहं तदपुनर्भवम् ॥ ३१ ॥
लोह ( सातलोह ) भस्म को चांदी के पत्रों के साथ मिलाकर फूंकने से यदि वह उन रजत पत्रों के साथ मिश्रित हो जाय तब उसको निरुत्थ कहते हैं ॥३१॥
अथ बीज लक्षणम्—
निर्वापणविशेषेण तत्तद्वर्णं भवेद्यदा ।
मृदुलं चित्रसंस्कारं तद्बीजमिति कथ्यते ॥ ३२ ॥
इदमेव विनिर्दिष्टं वैद्यैरुत्तरणं खलु ॥ ३३ ॥
किसी धातु को गलाकर उसमें अन्य धातु का निर्वापण करने से वह धातु कोमल और अद्भुत गुणों को करने वाली होजाती है इसी को बीज कहते हैं तथा वैद्य लोग इसको उत्तरण भी कहते हैं ॥ ३२–३३ ॥
ताडनस्वरूपम्—
संस्पृष्टलोहयोरेकलाहस्य परिनाशनम् ।
प्रध्मातं वङ्कनालेन तत्ताडनमुदाहृतम् ॥ ३४ ॥
दो धातु जब परस्पर मिली हो उनमें से एक धातु की शुद्धि करने के लिये और अन्य धातु को नष्ट करने के लिये उनको मूषायन्त्र में रखकर वङ्कनाल के द्वारा फूंकते हैं इसी को ताडन कहते हैं ॥ ३४ ॥
अथ धान्याभ्रलक्षणम्—
चूर्णाभ्रं शालिसंयुक्तं वस्त्रबद्धं हि काञ्जिके ।
निर्यातं मर्दनाद्वस्त्राद्धान्याभ्रमिति कथ्यते ॥ ३५ ॥
अष्टमोऽध्यायः । २३१
शुद्ध अभ्रक के छोटे २ टुकड़े ( चूर्ण ) बनाकर उसको धान के साथ ( भूषी युक्त चावल ) एक वस्त्र में रखकर पोटली बांध लेते हैं, फिर उस पोटली को काञ्जी में भिगोकर रख देते हैं । बाद में पोटली को कूटने से उसमें से जो अभ्रक का चूर्ण निकलता है उसको धान्याभ्रक कहते हैं ॥ ३५ ॥
अथ सत्त्वलक्षणम्—
क्षाराम्लद्रावकैर्युक्तं ध्मातमाकरकोष्ठके ।
यस्ततो निर्गतः सारः सत्त्वमित्यभिधीयते ॥ ३६ ॥
किसी धातु की भस्म को क्षार ( टंकण ) अम्ल ( काञ्जी ) और द्रावकवर्ग ( गुञ्जा, मधु, घृत, गुड़, ) के पदार्थों के साथ मिला कर कोष्ठिकायन्त्र में या मूषामें रखकर फूंक देने से जो उस भस्म का सार निकलता है उसको सत्त्व कहते हैं ॥ ३६ ॥
अथ एककोलिसकलक्षणम्—
कोष्ठिका शिखरापूर्णैः कोकिलैर्धमनियोगतः ।
मूषाकण्ठमनुप्राप्यैरेककोलीसको मतः ॥ ३७ ॥
एक कोष्ठिका को कोयलों से भरकर उन के बीच में द्रव्यों से भरी मूषा रखकर धौंकनी से फूंकना चाहिये । जब तक मूषा के भीतर का पदार्थ ( धातु ) उड़कर उसके कण्ठ में संलग्न न हो जाय तबतक यह क्रिया जारी रखनी चाहिए, इसी का नाम एककोलीसक है ॥ ३७ ॥
अथ द्रावणादिकर्मसाधने काष्ठनिर्देशः—
द्रावणे सत्त्वपाते च माधुकाः खादिराः शुभाः ।
दुर्द्भावे वंशजास्ते तु स्वेदने बादराः शुभाः ॥ ३८ ॥
किसी धातु के द्रावण या सत्त्वपातन करने के लिये महुए या खैरके काष्ठ या कोयले श्रेष्ठ हैं तथा जो वस्तु कठिनता से द्रव होती है उसके लिये बांस के काष्ठ या कोयले और स्वेदन कर्म में बैर के कोयलों अथवा लकड़ियों का प्रयोग करना चाहिए ॥ ३८ ॥
अथ हिङ्गुलाकृष्टरसः—
विद्याधराख्ययन्त्रस्थादार्द्रकद्रावमर्दितात् ।
समाकृष्टो रसो योऽसौ हिङ्गुलाकृष्ट उच्यते ॥ ३६ ॥
२३२ रसरत्नसमुच्चये—
हिङ्गुल को अदरक के स्वरस में घोटकर विद्याधरयन्त्र के द्वारा ( उसमें लेपकर ) उड़ाकर निकाले हुए पारद को हिङ्गुलाकृष्ट पारद कहते हैं ॥ ३९ ॥
अथ घोषाकृष्टताम्रलक्षणम्—
स्वल्पतालयुतं कांस्यं वङ्कनालेन ताडितम् ।
मुक्तवङ्गं हि तत्ताम्रं घोषाकृष्टमुदाहृतम् ॥ ४० ॥
कांस्य के अन्दर कुछ हरताल मिलाकर बङ्कनाल के द्वारा अग्नि में फूंकने से वङ्ग का भाग पृथक् हो जाता है और ताम्र पृथक् निकल जाता है इस ताम्र को घोषाकृष्ट ताम्र कहते हैं । कांस्य ताम्र और वंग के संयोग से बनता है उक्तविधि से ताम्र को पृथक् कर लेते हैं ॥ ४० ॥
अथ वरनागलक्षणम्—
तीक्ष्णनीलाञ्जनोपेतं ध्मातं हि बहुशो दृढम् ।
मृदु कृष्णं द्रुतद्रावं वरनागं तदुच्यते ॥ ४१ ॥
नाग को तीक्ष्ण लौह और नीलाञ्जन के साथ बहुत बार तेज आँच में फूंकने से जब वह अत्यन्त कोमल कृष्णवर्ण और अत्यन्त शीघ्र द्रुत होने लायक होजाय तब उसको वरनाग ( उत्तम सीस ) कहते हैं ॥ ४१ ॥
उत्थापनलक्षणम्—
मृतस्य पुनरुद्भूतिः सम्प्रोक्तोत्थापनाह्वया ॥ ४२ ॥
भस्म हुए लोह ( सप्तधातु ) को द्रावक वर्ग की औषधियों के साथ फूंकने से वह अपने स्वरूप में आजाता है इसी को उत्थापन कहते हैं ॥ ४२ ॥
ढालनलक्षणम्—
द्रुतद्रवस्य निक्षेपो द्रवे तद् ढालनं मतम् ॥ ४३ ॥
किसी धातु को अग्नि में द्रवित कर के द्रव में बुझाने से वह ढल (घन हो) जाती है, इसी को ढालन कहते हैं ॥ ४३ ॥
अथ नागसम्भूतचपलः—
त्रिंशत्पलमितं नागं भानुदुग्धेन मर्दितम् ।
विमर्द्य पुटयेत्तावद्यावत्कर्षावशेषितम् ॥ ४४ ॥
न तत्पुटसहस्रेण क्षयमायाति सर्वथा ।
चपलोऽयं समादिष्टो वार्तिकैर्नागसम्भवः ॥ ४५ ॥
अष्टमोऽध्यायः। २३३
अष्टमोऽध्यायः। २३३
३० पल ( १२० तो० ) नाग का चूर्ण बनाकर मदार के दुग्ध से भावित करके घोटलें, फिर गजपुट में उसे फूंकदें, इसविधि से बार २ मदार के दुग्ध से घोट-कर पुट देते देते जब उसकी मात्रा एक कर्ष (एक तोला) शेष रह जाती है उसी को वार्तिककारों ( रसशास्त्रपरिभाषानिर्माताविद्वानों ) ने नाग से उत्पन्न चपल कहा है । इस एक तोले का फिर यदि हजारों पुट भी दिये जावें तो भी वह नष्ट नहीं होता है ॥ ४४-४५ ॥
अथ वङ्गसम्भूतचपलः— इत्थं हि चपलः कार्यो वङ्गस्यापि न संशयः ॥ ४६ ॥
उपर्युक्त विधि से वङ्ग धातु को भी अर्कदुग्ध से भावित कर अनेक पुट द्वारा उससे चपल का निर्माण किया जाता है ॥ ४६ ॥
चपलकार्यम्— तत्स्पृष्टहस्तसंस्पृष्टः केवलो बध्यते रसः ॥ ४७ ॥
इस चपल को हाथों में मलकर पारद का स्पर्श मात्र करने से उसका बन्धन ( गोली ) हो जाता है, यह चपल का प्रभाव है ॥ ४७ ॥
बद्धरसोपयोगः— स रसो धातुवादेषु शस्यते न रसायने । अयं हि खर्वणाख्येन लोकनाथेन कीर्तितः ॥ ४८ ॥
चपल के द्वारा बद्ध हुए रस का उपयोग धातु वाद ( लोह से स्वर्ण बनाने ) में होता है । रसायन कर्म में इस पारे का उपयोग नहीं करना चाहिए । यह विधि खर्वण नामक लोकनाथ ने कही है ॥ ४८ ॥
अथ धौतम्— भूभुजङ्गशकृत्तोयैः प्रक्षाल्यापहृतं रजः । कृष्णवर्णं हि तत्प्रोक्तं धौताख्यं रसवादिभिः ॥ ४९ ॥
केञ्चुओं की विष्ठा को जल में घोल ( विलयन ) बना कर उस घोल में राख ( अर्थात् चपल बनाते समय जो नाग या वङ्ग का भाग राख में रह जाता है उसे ) को घुलाकर छानने से जो काले वर्ण का चूर्ण प्राप्त होता है उसको रसवादी धौत नाग और धौतवङ्ग कहते हैं । कुछ लोगों का यह अभिप्राय है कि केवल केञ्चुओं की विष्ठा को पानी में घोलकर छानने से जो कृष्ण वर्ण का चूर्ण प्राप्त होता है वह धौत कहा जाता है, परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है ॥ ४९ ॥
२३४ : रसरत्नसमुच्चये—
अथ द्वन्द्धानम्— द्रव्ययोर्मर्दनाध्मानाद्द्वन्द्धानं परिकीर्तितम् ॥ ५० ॥ दो धातुओं को एक साथ मिलाकर फूंकने से या मर्दन करने से जो एकी करण किया जाता है उसको द्वन्द्धान् कहते हैं ॥ ५० ॥
अथ भजनी— भागाद्द्रव्याधिके क्षेपमनुवर्णंसुवर्णके द्रवैर्वा वह्निकाग्रासो भजनी वादिभिर्मता ॥ ५१ ॥ सुवर्ण आदि धातुओं को विद्रुत कर उनमें अन्य पदार्थों के मिलाने को अनुवर्ण या सुवर्णक कहते हैं और धातुओं को गर्म कर किसी द्रव पदार्थ ( स्वरस ) के द्वारा उनकी अग्नि हरण करने को भजनी कहते हैं ॥ ५१ ॥
अथ चुलका— पतङ्गीकल्कतो जाता लोहे तारे च हेमता । दिनानि कतिचित्स्थित्वा यात्यसौ चुलका मता ॥ ५२ ॥ लोह या चांदी में कुछ औषधियों के संसर्ग से जो सुवर्ण सदृश रङ्ग (हेमता) उत्पन्न हो जाता है उसको पतङ्गी कहते हैं और कुछ दिनों के पश्चात् वह हेमता नष्ट हो जाती है उस अवस्था को चुलका कहते हैं । कुछ लोगों का मत है कि पतङ्गी नामक औषधि के कल्क में तार या लोह को कुछ दिन रखने से उनमें एक तरह से सुवर्ण के समान वर्ण उत्पन्न हो जाता है इसको चुलका कहते हैं ॥ ५२ ॥
अथ पतङ्गीरागः— रञ्जिताद्धि चिराल्लोहाद्धमानाद्वा चिरकालतः । विनिर्यास स निर्दिष्टः पतङ्गीरागसंज्ञकः ॥ ५३ ॥ रञ्जित किये हुए लौह के कुछ दिन तक पड़े रहने से या उस को फूंक देने से जो सत्त्व निकलता है उसको पतङ्गीराग कहते हैं ॥ ५३ ॥
अथ आवापः— द्रुते द्रव्यान्तरक्षेपो लोहाद्ये क्रियते हि यः । स आवापः प्रतीवापस्तदेवाऽऽच्छादनं मतम् ॥ ५४ ॥ अग्नि में विद्रुत हुए लोह में जो अन्य द्रव्य का प्रक्षेप किया जाता है उसको आवाप, प्रतीवाप अथवा आच्छादन कहते हैं ॥ ५४ ॥
अष्टमोऽध्यायः ।
२३५
अथ अभिषेकः—
द्रुते वह्निस्थिते लोहे विरम्राष्टनिमेषकम् ।
सलिलस्य परिक्षेपः सोऽभिषेक इति स्मृतः ॥ ५५ ॥
वह्नि के संयोग से द्रुत हुए लोहादिक में आठ निमेष के पश्चात् जो जल का छिड़काव दिया जाता है या जल डाला जाता है उसको अभिषेक कहते हैं ॥ ५५ ॥
अथ निर्वापलक्षणम्—
तप्तस्याप्सु विनिक्षेपो निर्वापः स्नपनं च तत्॥ ५६॥
प्रतप्त लोह (सप्त या अष्ट धातु) को किसी औषधि के स्वरस में बुझाने को स्नपन या निर्वाप कहते हैं ॥ ५६ ॥
प्रतिवापसमयनिर्देशः—
प्रतीवापादिकं कार्यं द्रुते लोहे सुनिर्मले ॥ ५७ ॥
जब लोह अग्नि से द्रव होकर निर्मल हो जाय तभी उसका प्रतीवाप, स्नपन, और अभिषेक करना चाहिए ॥ ५७ ॥
अथ शुद्धावर्तः—
यदा हुताशो दीप्तार्चिः शुक्लोत्थानसमन्वितः ।
शुद्धावर्तस्तदा ज्ञेयः स कालः सत्त्वनिर्गमे ॥ ५८ ॥
जब अग्नि अच्छी तरह से प्रज्वलित हो जाय और उसमें से शुक्लता लिये हुए लालरंग की तीव्र लपटें निकलने लगें उस समय उसको शुद्धावर्त कहते हैं, धातुओं का सत्त्व इसी अवस्था में निकलता है, अर्थात् धातुओं के सत्त्व को उत्तम रीति से निकालने के लिये इतनी तेज आँच करनी आवश्यक है ॥ ५८ ॥
अथ बीजावर्तः—
द्राव्यद्रव्यनिभा ज्वाला दृश्यते धमने यदा ।
द्रावस्योन्मुखता सेयं बीजावर्तः स उच्यते ॥ ५९ ॥
किसी धातु का द्रावण करने के लिये उसको अग्नि में रख कर धौंकनी से धौंकते हैं, उस समय अग्नि में उस धातु के रंग के सदृश ज्वाला दिखाई देती है इसी समय में उस धातु का द्रव होना प्रारम्भ होता है इसको बीजावर्त कहते हैं ॥ ५९॥
अथ स्वाङ्गशीतलम्—
वह्निस्थमेव शीतं यत्तदुक्तं स्वाङ्गशीतलम् ॥ ६० ॥
२३६ रसत्नसमुच्चये—
किसी वस्तु को अग्नि पर पकाकर आंच देना बन्द कर देते हैं, जब वह वस्तु वायुमण्डल की शीतता से चूल्हे पर स्थित ही शीतल हो जाती है उसको स्वाङ्गशीतल कहते हैं ॥ ६० ॥
अथ वहिःशीतलम्— अग्नेराकृष्य शीतं यत्तद्वहिः शीतमुच्यते ॥ ६१ ॥ किसी वस्तु का अग्नि मे पाक कर फिर उसको अग्नि से नीचे रख कर शीतल करते हैं इसको बहिःशीत कहते हैं ॥ ६१ ॥
अथ स्वेदनलक्षणम्— क्षाराम्लैरौषधैर्वाऽपि दोलायन्त्रे स्थितस्य हि । पचनं स्वेदनाख्यं स्यान्मलशैथिल्यकारकम् ॥ ६२ ॥ क्षार (जवाखार, सुहागा, इत्यादि) तथा अम्ळवर्ग की औषधियों का स्वरस दोलायन्त्र में भर कर उस में पारद, लोह, शंख, शुक्ति इत्यादि पदार्थों को उनके साथ पाचन करते हैं, इसको स्वेदन संस्कार कहते हैं। स्वेदन संस्कार करने से उस धातु का कुछ मल भाग पृथक् हो जाता है ॥ ६२ ॥
अथ मर्दनलक्षणम्— उदितै रौषधैः सार्धं सर्वाम्लः काञ्जिकैरपि । पेषणं मर्दनाख्यं स्याद्वहिर्मलविनाशनम् ॥ ६३ ॥ भिन्न २ वस्तु के मर्दन के लिये कही हुई औषधियों के साथ या सर्वप्रकार के अम्ल पदार्थों के स्वरस द्वारा (जिसके लिये जिसका शास्त्र में निर्देश हो) अथवा काञ्जी के साथ पारद या अन्य पदार्थ का खरल में पेषण करते हैं। इसको मर्दन संस्कार भी कहते हैं, इस संस्कार से भी पारद या अन्य पदार्थों के बहिर्मल का विनाश होता है ॥ ६३ ॥
अथ मूर्च्छनलक्षणम्— मर्दनाऽऽदिष्टभैषज्यैर्नष्टपिष्टत्वकारकम् । तन्मूर्च्छनं हि वङ्गाहि-भुजङ्गकञ्चुकनाशनम् ॥ ६४ ॥ मर्दनसंस्कार में कही हुई औषधियों के चूर्ण, स्वरस या क्वाथ के साथ पारद को घोटकर उसकी कज्जली या पिण्ड अथवा सूक्ष्म चूर्ण कर लेते हैं इसको
अष्टमोऽध्यायः।
अष्टमोऽध्यायः। २३७
मूर्च्छन संस्कार कहते हैं । यह संस्कार पारद के नाग, वङ्ग आदि महादोषों (१) को नष्ट करता है । पारद के अतिरिक्त अन्य पदार्थों का भी मूर्च्छन संस्कार करने से गुणोत्कर्ष होता है ॥ ६४ ॥
अथोत्थापनादिलक्षणम्—
स्वेदातपादियोगेन स्वरूपापादनं हि यत् ।
तदुत्थापनमित्युक्तं मूर्च्छाव्यापत्तिनाशनम् ॥ ६५ ॥
मूर्च्छन संस्कार के कारण विरूपित हुए (नष्टपिष्ट हुए) पारद को फिर दोलायंत्र द्वारा स्वेदन करके या अग्नि और सूर्य के सन्ताप के द्वारा अपने पूर्व रूप में ले आते हैं, इसी को उत्थापन संस्कार कहते हैं । क्योंकि इस संस्कार से पारद पुनः स्वस्वरूप को ग्रहण कर लेता है ॥ ६५ ॥
बन्धलक्षणम्—
स्वरूपस्य विनाशेन पिष्टत्वादूध्वन्धनं हि तत् ।
विद्वद्भिर्निर्जितः सूतो नष्टपिष्टिः स उच्यते ॥ ६६ ॥
गन्धकादिक भिन्न २ पदार्थों के साथ पारद को घोटने से उसका श्वेत और चपलगुण नष्ट होकर चूर्ण या कज्जली बन जाती है और इस पेषण के कारण उसका बन्धन (मूर्तिबद्धरूप अथवा वह्निनाऽनुच्छिद्यमानत्व) हो जाता है । इस प्रकार से जीते हुए (स्वाधीन किये हुए) पारद का विद्वान् लोग नष्टपिष्टि कहते हैं ॥ ६६ ॥
अथ पातनलक्षणम् —
उक्तौषधैर्मर्दितपारदस्य यन्त्रास्थितस्योर्ध्वमधश्च तिर्यक् ।
निर्यातनं पातनसंज्ञमुक्तं वङ्गाहिसम्पर्कजकञ्चुकघ्नम् ॥ ६७ ॥
स्वेदन, मर्दनादिक संस्कार में बताई हुई तथा अन्य शास्त्रोक्त औषधियों के साथ पारद को खरल में घोट करके ऊर्ध्वपातन, अधः पातन और तिर्यक् पातन यन्त्रों में लेप कर के या चूर्ण रूप ही में रख कर क्रम से पारद को ऊपर, नीचे और तिर्यक् मार्ग से उड़ाते हैं, इस को पातन कहते हैं । इस पातन संस्कार से पारद के नाग और वङ्ग से उत्पन्न कंचुकादिक दोष नष्ट हो जाते हैं । वास्तव में खनिज पारद में नाग, वङ्ग हरताल आदि बहुत से पदार्थ मिले रहते हैं । उन
( १ ) नागो वङ्गो मलोवह्निश्वापल्यञ्च विषंगिरिः ।
असह्याग्निर्महादोषा निसर्गाः पारदे स्थिताः ॥