रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५६ रसरत्नसमुच्चये—
के बने हुए पात्रमें रसका स्वेदन करने से वह अधिक गुणों वाला हो जाता है॥४४-४६॥
अथ तिर्यक्पातनयन्त्रम्—
क्षिपेद्रसं घटे दीर्घनताधोनालसंयुते ।
तन्नालं निक्षिपेदन्यघटकुड्यन्तरे खलु ॥ ४७ ॥
तत्र रुध्वा मृदा सम्यग्वदने घटयोरथ ।
अधस्ताद्रसकुम्भस्य ज्वालयेत्तीव्रपावकम् ॥ ४८ ॥
इतरस्मिन्घटे तोयं प्रक्षिपेत्स्वादु शीतलम् ।
तिर्यक्पातनमेतद्धि वार्तिकैरभिधीयते ॥ ४९ ॥
एक मिट्टी के घड़े में रस रखकर उसकी ग्रीवा के कुछ नीचे के भाग में एक छिद्र बना कर उस छिद्र में एक लम्बी तथा टेढी नली लगा देनी चाहिए। फिर उस नली के दूसरे भाग को एक दूसरे घड़े के मध्यभाग में छिद्र बनाकर उसमें प्रविष्ट कर देवें। फिर दोनों घड़ों के मुख तथा नालीप्रवेशजन्य छिद्रों को कपड़ मिट्टी द्वारा बन्द कर देना चाहिए। पश्चात् जिस घड़े में पारद रखा हो उसके नीचे अग्नि जला देवें और दूसरे पात्र के ऊपर शीतल जल डालते रहना चाहिए अथवा इस घड़े में मुखबन्धन के पूर्व ही थोड़ा सा शीतल जल भर देना चाहिए। इस तरह अग्नि के ताप से पूर्व घट से पारद उड़ कर तिर्यक् नली के द्वारा वह दूसरे घट के अन्दर पानी में गिर जाता है। वार्त्तिककारों ने इस यन्त्र को तिर्यक्पातन यन्त्र कहा है ॥ ४७-४९ ॥
अथ पालिकायन्त्रम्—
चषकं वर्त्तुलं लौहं विनताग्रोध्वर्दण्डकम् ।
एतद्धि पालिकायन्त्रं बलिजारणहेतवे ॥ ५० ॥
लोहे का एक गोल चषक (प्याला) बनाकर उसके किनारे के पास ही अग्र-भाग में झुका हुआ और ऊपर की ओर उठा हुआ एक दण्ड लगवा देना चाहिए। इसको पालिकायंत्र कहते हैं। यह यंत्र गन्धक के जारण करने में उपयोगी होता है ॥५०॥
अथ घटयन्त्रम्—
चतुष्प्रस्थजलाधारश्चतुरङ्गुलिकाऽऽननः ।
घटयन्त्रमिदं प्रोक्तं तदाप्यायनकं स्मृतम् ॥ ५१ ॥
एक ऐसा घट लेना चाहिए जिसमें चार प्रस्थ (६४ पल) पानी का समा-