रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
पृष्ठ 347, कुल 362 में से
संदर्भ में पढ़ें-- नवमोऽध्यायः । २२७ --
वेश हो सके तथा चार अङ्गुल चौड़ा जिसका मुख हो, इस प्रकार के घट को घट-यन्त्र कहते हैं तथा इसका दूसरा नाम आप्यायनक भी है। इस यंत्र के द्वारा रसादिक का तर्पण (प्लावन) करते हैं ॥ ५१ ॥
अथ इष्टिकायन्त्रम्—
विधाय वर्त्तुलं गतं मल्लमात्रं निधाय च ।
विनिधायेष्टकां तत्र मध्यगर्तवतीं शुभाम् ॥ ५२ ॥
गर्तस्य परितः कुर्यात्पालिकामङ्गुलोच्छ्रयाम् ।
गर्ते सूतं विनिक्षिप्य गर्तास्ये वसनं क्षिपेत् ॥ ५३ ॥
निक्षिपेद्गन्धकं तत्र मल्लेनाऽऽस्यं निरुध्य च ।
मल्लपालिकयोर्मध्ये मृदा सम्यङ् निरुध्य च ॥ ५४ ॥
वनोत्पलैः पुटं देयं कपोताख्यं न चाधिकम् ।
इष्टिकायन्त्रमेतत्स्याद्गन्धकं तेन जारयेत् ॥ ५५ ॥
पृथ्वी में एक गोलाकार गड्ढा खोदकर उसमें लोहे का अथवा मिट्टी का १ मजबूत सकोरा रख देवें। फिर उस सकोरे पर बीच में छिद्र की हुई एक इष्टिका (ईंट) रखकर उस इष्टिका के छिद्र के चारों ओर एक अङ्गुल ऊंचाई वाली पाली (थाला या आलवाल) बना करके उस ईंट के छिद्र में पारद डालकर छिद्र के मुख पर एक वस्त्र बांध देना चाहिए। उस वस्त्र पर गन्धक बिछा कर एक दूसरे सकोरे से उसका मुख बन्दकर देना चाहिए। ईंट के छिद्र के चारों ओर बनाई हुई पालिका तथा उस पर ढके हुए मल्ल (कटोरी या सकोरा) इन दोनों के बीच के अवकाश को ठीक तरह से कपड़मिट्टी द्वारा बन्दकर जंगली उपलों की आंच से कपोत पुट देना चाहिए, ज्यादा आंच नहीं देना चाहिए। इसको इष्टिकायंत्र कहते हैं। इससे पारद इत्यादि धातुओं के साथ गन्धक का जारण करते हैं ॥५२-५५॥
अथ हिङ्गुलाकृष्टिविद्याधरयन्त्रम्—
स्थालिकोपरि विन्यस्य स्थालीं सम्यङ् निरुध्य च ।
ऊर्ध्वस्थाल्यां जलं क्षिप्त्वा वह्निं प्रज्वालयेदधः ॥
एतद्विद्याधरं यन्त्रं हिङ्गुलाकृष्टिकहेतवे ॥ ५६ ॥
एक हण्डिका (जो कि भीतर से चौड़ी हो और जिसके भीतरी भाग में निम्बू के रस में घोटे हुए हिङ्गुल का लेप किया हुआ होना चाहिए) के ऊपर दूसरी
रस० १७