रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६० रसरत्नसमुच्चये—
चिपिटां च तले प्रोक्तं ग्रस्तयन्त्रं मनीषिभिः ॥
सूतेन्द्ररन्धनार्थं हि रसविद्भिरुदीरितम् ॥ ६५ ॥
प्रारम्भ से अन्त तक एक समान लम्बी, चौड़ी और गोल तथा तल भाग में कुछ चिपटी हो ऐसी एक मूषा बनवा कर उसमें पारद इत्यादि को भर कर ऐसी ही एक दूसरी मूषा के साथ सन्धिवन्धन कर देना चाहिए। इसको रसशास्त्र के पण्डित ग्रस्तयंत्र कहते हैं। इस यंत्र से पारद का पाक या भस्म करते हैं ॥ ६५ ॥
अथ स्थालीयन्त्रम्—
स्थाल्यां ताम्रादि निक्षिप्य मल्लेनाऽस्यं निरुध्य च ।
पच्यते स्थालिकाधस्तात्स्थालीयन्त्रमिदं स्मृतम् ॥ ६६ ॥
एक मिट्टी की हण्डिका में ताम्र अथवा अन्य धातु भरकर (अम्लरस या क्वाथ के साथ) सकोरे से हण्डिका का मुख कपड़मिट्टी से अच्छी तरह बन्दकर के हण्डिका के नीचे अग्नि जलाते हैं। इसको स्थालीयन्त्र कहते हैं ॥ ६६ ॥
अथ धूपयन्त्रम्—
विधायाष्टाङ्गुलं पात्रं लौहमष्टाङ्गुलोच्छ्रयम् ।
कण्ठाधो द्व्यङ्गुले देशे गलाधारे हि तत्र च ॥ ६७ ॥
तिर्यग्लोहशलाकाश्च तन्वीस्तिर्यग्विनिक्षिपेत् ।
तनूनि स्वर्णपत्राणि तासामुपरि विन्यसेत् ॥ ६८ ॥
पत्राधो निक्षिपेद्धूमं वक्ष्यमाणमिहैव हि ।
तत्पात्रं न्युब्जपात्रेण च्छादयेदपरेण हि ॥ ६९ ॥
मृदा विलिप्य सन्धिञ्च वह्निं प्रज्वालयेदधः ।
तेन पत्राणि कृत्स्नानि हतान्युक्तविधानतः ॥ ७० ॥
रसश्चरति वेगेन द्रुतं गर्भे द्रवन्ति च ।
गन्धालकशिलानां हि कज्जलया वा मृताहिना ॥ ७१ ॥
धूपनं स्वर्णपत्राणां प्रथमं परिकीर्त्तितम् ।
तारार्थं तारपत्राणि मृतवङ्गेन धूपयेत् ॥ ७२ ॥
धूपयेच्च यथायोग्यैरन्यैरुपयसैरपि ।
धूपयन्त्रमिदं प्रोक्तं जारणाद्रवसाधने ॥ ७३ ॥
आठ अङ्गुल चौड़ा और आठ ही अङ्गुल ऊंचा एक लोह का पात्र बनवा कर