भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

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नवमोऽध्यायः । २६१

उसके कण्ठ के नीचे दो अङ्गुल चौड़े स्थान में एक आधार बनवा कर उस में पतली और तिरच्छी लोहे की शलाकाओं को टेढ़ी रख देनी चाहिए । फिर उन शलाकाओं के ऊपर छोटे २ कण्टक वेध्य सोने के पत्र रखकर प्रथम पत्रों के नीचे गन्धक हरताल आदि की कज्जली लौहपात्र में डालकर उसपात्र को एक दूसरे नीचे मुखवाले पात्र से ढककर कपड़मिट्टी (या जलमृत्तिका) से सन्धिबन्धन करके चूल्हे पर चढ़ा कर नीचे आग जलाना चाहिए । इस तरह पात्र में रखी हुई कजली के धूम से सोने के पत्र काले पड़ जाते हैं तथा मृत भी हो जाते हैं । इस तरह से मृत सुवर्णपत्रों को पारद तुरन्त ही भक्षण कर जाता है और वे भक्षण किये हुए पत्र पारद में शीघ्र हो द्रुत हो जाते है । गन्धक, हरताल, मनःशिला, इनकी कज्जली से अथवा मृतनाग से स्वर्णपत्रों को प्रथम धूपित करना चाहिए । चांदी के पत्रों को धूपित करने के लिये उन पत्रों को मृतवङ्ग से धूपित करना चाहिए । अन्य यथायोग्य उपरसों से भी तारपत्रों को धूपित करते हैं । (जिस वस्तु से पत्रों को धूपित करना हो उस वस्तु की कजली बनाकर पत्रों के नीचे लोह पात्र में रख देनी चाहिए) इसको धूपयन्त्र कहते हैं । इस यंत्र को जारण करने योग्य द्रव्यों कि सिद्धि करने के लिये प्रयुक्त करते है ॥ ६७-७३ ॥

अथ कन्दुकयन्त्रम्—

स्थूलस्थाल्यां जलं क्षिप्त्वा वासो बध्वा मुखे दृढम् ।
तत्र स्वेद्यं विनिक्षिप्य तन्मुखं प्रपिधाय च ॥ ७४ ॥
अधस्ताज्ज्वलयेदग्निं यन्त्रं तत्कन्दुकाभिधम् ।
स्वेदनीयन्त्रमित्यन्ये प्राहुश्छेदं मनीषिणः ॥ ७५ ॥

एक बड़े मिट्टी के भाण्ड में जल अथवा किसी औषधि का स्वरस अथवा क्वाथ भर कर उस का मुख एक मजबूत वस्त्र से बांध कर उस वस्त्र पर स्वेदन करने की वस्तु रख कर उस भाण्ड के मुख को सकोरे द्वारा ढक कर कपड़मिट्टी से बन्द कर देवें । फिर चूल्हे पर चढ़ा कर नीचे अग्नि जलानी चाहिए । इस को कन्दुकयन्त्र कहते हैं । अन्य रस शास्त्र के पण्डितों ने इस को स्वेदनीयन्त्र भी कहा है ॥ ७४-७५ ॥

अथ प्रकारान्तरम्—

यद्वा स्थाल्यां जलं क्षिप्त्वा तृणं क्षिप्त्वा मुखोपरि ।
स्वेद्यद्रव्यं परिक्षिप्य पिधानं प्रविधाय च ।