भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

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१६२रसरत्नसमुच्चये—

अधस्ताज्ज्वलयेदग्निं यन्त्रं तत्कन्दुकं स्मृतम् ॥ ७६ ॥

अथवा भाण्ड के भीतर जलादिक भर करके मुख पर वस्त्र नहीं लगा कर तृण ( घास फूस ) भर देते हैं और उन तृणों पर स्वेदत करने योग्य वस्तु को रख कर सकोरे से मुख बन्द करके कपड़ मिट्टी से सन्धि बन्धन कर देते हैं तथा नीचे अग्नि जला देते हैं। इसको भी कन्दुक यन्त्र कहते हैं ॥ ७६ ॥

अथ खल्लयन्त्रम्—

खल्लयोग्या शिला नीला श्यामा स्निग्धा दृढा गुरुः ।
षोडशाङ्गुलकोत्सेधा नवाङ्गुलकविस्तरा ॥ ७७ ॥
चतुर्विंशाङ्गुला दीर्घा घर्षणी द्वादशाङ्गुला ।
विंशत्यङ्गुलदीर्घा वा स्यादुत्सेधे दशाङ्गुला ॥
खल्लप्रमाणं तज्ज्ञेयं श्रेष्ठं स्याद्रसकर्मणि ॥ ७८ ॥

खरल बनाने के लिये नीली अथवा कालेरंग की चिकनी, मजबूत ओर भारी शिला ( पत्थर ) लेनी चाहिए। ऐसी शिला से १६ अङ्गुल ऊंची, ९ अङ्गुल चौड़ी और २४ अङ्गुल लम्बी खरल तथा उसमें घोटने की १२ अङ्गुल लम्बी घर्षणी बनवानी चाहिए। अथवा १० अङ्गुल ऊंची और २० अङ्गुल लम्बी खरल बनवाना चाहिए। इस तरह का खरल की लम्बाई चौड़ाई का प्रमाण पारद आदि के शोधन मर्दन संस्कारों के लिये ठीक होता है ॥ ७७-७८ ॥

अथ खल्लयन्त्रस्य त्रैविध्यनिर्देशः—

खल्लयन्त्रं त्रिधा प्रोक्तं रसादिसुखमर्दने ॥ ७९ ॥

रस आदि पदार्थों को अच्छी तरह सुखपूर्वक घोटने के लिये ३ प्रकार के खल्ल यन्त्र कहे गये हैं ॥ ७९ ॥

द्विविधखल्लयोः सामान्यलक्षणम् ।

निरुद्गारौ सुमसृणौ कार्यों पुत्रिकया युतौ ॥ ८० ॥

उनमें से दो प्रकार की खरलें स्पर्श में स्निग्ध तथा उनमें रखी हुई वस्तु घोटने से बाहर न गिर सकें, ऐसी होनी चाहिएं। साथ में घोटने की घर्षणी ( बत्था ) भी चिकनी और योग्य प्रमाण की होनी चाहिए ॥ ८० ॥

अर्धचन्द्राकृतिकखल्लनिर्देशः—

उत्सेधे स दशाङ्गुलः खलु कलातुल्याङ्गुलायामवान्
विस्तारेण दशाङ्गुलो मुनिमितैर्निम्नस्तथैवाङ्गुलैः ।